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Saturday, March 14, 2026
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महाबोधि महाविहार को लेकर रायपुर में विशाल रैली, बौद्ध महासभा व बुद्धिस्ट फोरम ने उठाई आवाज़

बोधगया स्थित विश्वविख्यात महाबोधि महाविहार को बौद्ध समुदाय को सौंपने की मांग को लेकर आज छत्तीसगढ़ के इतिहास में एक ऐसा दिन दर्ज हो गया, जब राजधानी रायपुर से लेकर प्रदेश के अनेक जिलों तक हजारों की भीड़ सड़कों पर उतरी और एक सुर में इस ऐतिहासिक अन्याय को खत्म करने की हुंकार भर दी। ऑल इंडिया बुद्धिस्ट फोरम के आव्हान पर तथा भारतीय बौद्ध महासभा रायपुर के नेतृत्व में निकली इस ऐतिहासिक महारैली में रायपुर में दोपहर 12 बजे देवेंद्र नगर बुद्ध विहार से जब विशाल जुलूस शुरू हुआ, तो देखते ही देखते पूरा शहर नारों, बैनरों और आस्था की लहर से गूंज उठा। इस रैली में बच्चों, बुजुर्गों, महिलाओं और युवाओं की बड़ी संख्या में मौजूदगी ने दिखा दिया कि यह आंदोलन सिर्फ कुछ लोगों की पहल नहीं, बल्कि पूरे समाज की चेतना बन चुका है।

रैली जैसे–जैसे अंबेडकर चौक की ओर बढ़ी, रास्ते भर लोग हाथों में महाबोधि महाविहार की मुक्ति के नारे लिखी तख्तियां और पोस्टर थामे चलते रहे। ‘‘BTMC एक्ट खत्म करो’’, ‘‘महाबोधि महाविहार बौद्धों को सौंपो’’ जैसे नारों से राजधानी की गलियों में एक नई ऊर्जा दौड़ गई। दुकानों, घरों और चौराहों पर खड़े लोग भी इस ऐतिहासिक क्षण के गवाह बने। रैली के समापन पर राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और बिहार के मुख्यमंत्री के नाम राज्यपाल छत्तीसगढ़ को ज्ञापन सौंपा गया, जिसमें साफ तौर पर कहा गया कि जैसे हर धार्मिक स्थल का प्रबंधन उसके अनुयायियों के पास है, उसी तरह महाबोधि महाविहार का प्रबंधन भी पूरी तरह से बौद्ध समाज को सौंपा जाए।

महाबोधि महाविहार सिर्फ एक ऐतिहासिक धरोहर नहीं, बल्कि वह पवित्र स्थल है जहाँ भगवान बुद्ध ने ज्ञान प्राप्त किया। यह करोड़ों बौद्ध अनुयायियों की आस्था का सबसे बड़ा प्रतीक है। लेकिन आज भी इसका प्रबंधन हिन्दू बहुल समिति के हाथों में है, जो बौद्ध अनुयायियों के लिए पीड़ा और असंतोष का कारण बना हुआ है। बौद्ध समाज का कहना है कि यह दुनिया का इकलौता उदाहरण है, जहाँ किसी दूसरे धर्म के लोगों के हाथ में इतने महत्वपूर्ण बौद्ध स्थल का नियंत्रण है। इस अन्याय को खत्म करने के लिए ही आज का आंदोलन खड़ा हुआ है।

रायपुर की महारैली के साथ–साथ पूरे छत्तीसगढ़ में भी आंदोलन की लहर दौड़ी। दुर्ग में बुद्ध विहार से रैली निकली, जिसमें युवाओं का जोश देखते ही बनता था। बिलासपुर में बुद्ध विहार चौक पर सैकड़ों लोगों ने बैनर और पोस्टर के साथ प्रदर्शन किया। राजनांदगांव में सभा हुई, जिसमें वक्ताओं ने कहा कि महाबोधि महाविहार की मुक्ति सिर्फ बौद्ध समाज का सवाल नहीं, बल्कि संविधान और धार्मिक स्वतंत्रता का भी मुद्दा है। महासमुंद, धमतरी, बेमेतरा, कवर्धा, कोरबा और अन्य जिलों में भी बुद्ध विहारों में बैठकों, रैलियों और सभाओं का आयोजन कर हजारों लोगों ने आंदोलन को समर्थन दिया।

पहली बार पूरे छत्तीसगढ़ में एक साथ इतनी बड़ी तादाद में बौद्ध अनुयायी एकजुट होकर सामने आए। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक, हर किसी ने तन–मन–धन से सहयोग किया। उनकी आँखों में सिर्फ एक ही सपना था—अपने सबसे पवित्र स्थल महाबोधि महाविहार का सम्मान और अधिकार वापस पाना। इस आंदोलन ने दिखा दिया कि महाबोधि महाविहार सिर्फ बिहार का एक मंदिर नहीं, बल्कि बौद्ध अस्मिता और आत्मसम्मान का जीवित प्रतीक है, जिसके बिना बौद्ध समाज की पहचान अधूरी है।

भारतीय बौद्ध महासभा रायपुर और ऑल इंडिया बुद्धिस्ट फोरम ने उन सभी लोगों का आभार जताया, जिन्होंने इस ऐतिहासिक रैली और आंदोलन में बढ़–चढ़कर हिस्सा लिया। महासभा ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यह लड़ाई तब तक जारी रहेगी, जब तक महाबोधि महाविहार का प्रबंधन पूरी तरह से बौद्ध समुदाय के हाथ में नहीं सौंपा जाता। उनका कहना था कि यह सिर्फ एक मंदिर का सवाल नहीं, बल्कि करोड़ों बौद्धों की आस्था और उनके संवैधानिक अधिकारों की रक्षा का सवाल है।

आज रायपुर की सड़कों पर उतरा जनसैलाब, जिलों की गलियों में उठी आवाज़ और हर बुद्ध विहार में जलते दीपक इस बात की गवाही दे रहे हैं कि बौद्ध समाज अब खामोश नहीं रहेगा। अब यह आवाज़ दिल्ली और पटना तक जाएगी और तब तक गूंजती रहेगी, जब तक महाबोधि महाविहार पर से वर्षों पुराना अन्याय खत्म नहीं हो जाता। इस आंदोलन ने सिर्फ छत्तीसगढ़ ही नहीं, बल्कि पूरे देश को यह दिखा दिया कि जब आस्था और अधिकार की बात आती है, तो लोग एकजुट होकर इतिहास बदलने की ताकत रखते हैं। महाबोधि महाविहार की मुक्ति की यह लड़ाई अब सिर्फ मांग नहीं रही, यह पूरे बौद्ध समाज का संकल्प बन चुकी है, जो तब तक चलेगी, जब तक न्याय नहीं मिल जाता

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