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Saturday, March 21, 2026
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अक्ति तिहार (अक्षय तृतीया) – छत्तीसगढ़िया संस्कृति के गाथा

अक्ति तिहार, जेनला अक्षय तृतीया घलो कहे जाथे, छत्तीसगढ़ मं बड़े धूमधाम ले मनाय जाथे। ये तिहार खेती-किसानी, बिहाव-बियाह अऊ बोनी-बजार ले जुड़ल हे।

का होथे अक्ति तिहार मं?

  1. पुतरी-पुतरा के बिहाव के सगुन:
    • ए दिन छत्तीसगढ़ के गाँव-गंवई मं नान पुतरी-पुतरा (लइका-लइकी) के नंदिया-गोड़वा के बिहाव के रस्म होथे।
    • एकर मतलब ये नइ कि आजे बिहाव हो जाही, बल्कि ये दिन सगुन मान के बिहाव तय करे जाथे।
  2. नवा बोनी (खेती के सुरुआत):
    • किसान मन अपन खेत मं पहिली बेर हल चलाथें, जेकरला नवा बोनी कहे जाथे।
    • धरती माता के पूजा करके बीज बोये जाथे, ताकि फसल हर सुखदाई अऊ भरपूर होवय।
  3. सोहारी अऊ सगुन चीज बनथे:
    • घर-घर मं लापसी, पूरी, चिला, कढ़ी-भात जइसन परसाद बनाय जाथे।
    • बहिनी मन अपन भैया ला सगुन देवय, जइसे चांउर, चना, नारियल, गमछा अऊ नरियल पानी
  4. गाँव-गाँव मं मेला लगथे:
    • कइ गाँव मं ए दिन हाट-बाजार लागथे, लोक नाचा-गाना, बइठका अऊ ददरिया होथे।
  5. अक्ति के सांस्कृतिक महत्व:
  6. ये तिहार धार्मिक, कृषि, अऊ सामाजिक परंपरा के संग जोड़ाय हे।
  7. एकर संग छत्तीसगढ़िया पहचान के अऊ गजब परछी दिखथे।
  8. सब्बो छत्तीसगढ़िया बहिनी-भाई मन ला अक्ति तिहार के गाड़ा बधाई! धरती मय्या तोर अंगना हर हरियर रहय, सुख-समृद्धि ल बनाय रखय।

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