भोरमदेव मंदिर, जिसे अक्सर ‘छत्तीसगढ़ का खजुराहो’ कहा जाता है, छत्तीसगढ़ के कबीरधाम जिले (कवर्धा) में मैकल पर्वत श्रृंखला के बीच चौरागाँव के निकट स्थित एक प्राचीन और ऐतिहासिक शिव मंदिर है। यह अपनी अद्भुत वास्तुकला, कलात्मक मूर्तियों और शांत प्राकृतिक वातावरण के लिए प्रसिद्ध है।
यहाँ भोरमदेव मंदिर से संबंधित प्रमुख जानकारी दी गई है:
इतिहास एवं निर्माण
- निर्माण काल: माना जाता है कि इस मंदिर का निर्माण 11वीं शताब्दी (लगभग 7वीं से 11वीं शताब्दी) के दौरान हुआ था।
- निर्माता: अधिकांश ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार, इस मंदिर का निर्माण फणी नागवंशी शासक राजा गोपाल देव ने करवाया था। मंदिर के मंडप में एक योगी की मूर्ति पर एक लेख मिला है, जिसमें निर्माण का समय कल्चुरी संवत 840 बताया गया है।
- नामकरण: ऐसा कहा जाता है कि गोंड राजाओं के देवता भोरमदेव थे, जो भगवान शिव के ही एक नाम थे। इसी कारण इस मंदिर का नाम भोरमदेव पड़ा।
वास्तुकला और विशेषताएँ
- शैली: यह मंदिर नागर शैली की वास्तुकला का एक उत्कृष्ट उदाहरण है।
- आधार: मंदिर का निर्माण एक पाँच फुट ऊँचे चबूतरे पर किया गया है।
- मंडप: मंदिर का मुख पूर्व की ओर है और इसमें तीन ओर से प्रवेश किया जा सकता है। मंडप की छत को बीच में 4 और किनारों पर 12 सुंदर एवं कलात्मक खंभों ने संभाल रखा है।
- गर्भ गृह: मंदिर के शिखर के अंदर एक गर्भगृह है, जहाँ भगवान शिव का पवित्र शिवलिंग स्थापित है।
- ‘छत्तीसगढ़ का खजुराहो’: मंदिर की दीवारों पर बनी सैकड़ों शिल्प-आकृतियों में काम-शिल्प, काम-कामुकता और जीवन की विविध झलक स्पष्ट रूप से उभरती है। मूर्तियों की यह कामुक और कलात्मक नक्काशी खजुराहो मंदिरों की झलक दिखाती है, जिसके कारण इसे यह उपनाम दिया गया है।
धार्मिक और पर्यटन महत्व
- धार्मिक केंद्र: भोरमदेव मंदिर शिव भक्तों के लिए एक प्रमुख तीर्थ स्थल है। यहाँ हर साल शिवरात्रि के अवसर पर विशेष पूजा-अर्चना की जाती है।
- प्राकृतिक सौंदर्य: यह मंदिर मैकल पर्वत समूह की हरी-भरी घाटी के मध्य स्थित है। मंदिर के सामने एक सुंदर तालाब भी है, जो इस स्थल की प्राकृतिक सुंदरता को और बढ़ा देता है।
- आकर्षण के केंद्र: भोरमदेव मंदिर के पास ही फणी नागवंशी राजा रामचंद्र और नागवंशी रानी अंबिका देवी के विवाह के प्रतीक के रूप में मड़वा महल (जिसे विवाह मंडप की आकृति का होने के कारण मड़वा महल कहा जाता है) और छेरकी महल जैसे अन्य प्राचीन मंदिर भी मौजूद हैं।
- भोरमदेव महोत्सव: यहाँ हर साल भोरमदेव महोत्सव का आयोजन किया जाता है, जो छत्तीसगढ़ के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक उत्सवों में गिना जाता है।


