पर्वत, वन, सरिता और हरियाली के अदभुत संगम को निहारने की उत्कंठा है तो अमरकंटक पहुंच जाएं। वर्षा ऋतु में अमरकंटक की छठा और निखर जाती है। ऐसा प्रतीत होता है कि पहाड़ों के बीच बादल जमीन पर उतर आए हैं। मध्य प्रदेश के अनूपपुर जिले में विंध्य और सतपुड़ा पर्वत श्रृंखला के बीच स्थित अमरकंटक को तीर्थराज की संज्ञा भी दी गई है।
यह देश की पवित्र नदियों में से एक नर्मदा का उद्गम स्थल है। समुद्र तट से लगभग 1065 मीटर ऊंचाई पर स्थित अमरकंटक हिल स्टेशन की अनुभूति कराता है। कल्चुरी कालीन प्राचीन मंदिरों के लिए प्रसिद्ध अमरकंटक घने जंगल और औषधीय गुणों से भरपूर पौधे के लिए प्रसिद्ध है। अमरकंटक की यात्रा आध्यात्मिक स्पर्श कराती है। यहां जबलपुर से वाया डिंडौरी पहुंचा जा सकता है। शहडोल और बिलासपुर से भी अमरकंटक पहुंचा जा सकता है।
नर्मदा नदी का 100 फीट ऊंचा जलप्रपात
पूर्व से पश्चिम की दिशा में बहने वाली देश की दो नदियों में एक नर्मदा का उद्गम एक छोटे से कुंड से हुआ है। पानी की झिर इस कुंड से होकर सहायक बड़े आयाताकार कुंड में एकत्र होती है। इस जलसंरचना का निर्माण कल्चुरी काल में किया गया। पत्थरों की चाहरदीवारी के अंदर पत्थर से निर्मित नर्मदा मंदिर, शिव, अन्नपूर्णा, गुरु गोरखनाथ, श्री रामजानकी और श्री राधा कृष्ण मंदिर सदियों पुरानी स्थापत्य कला सहेजे हुए हैं।
मंदिर परिसर के आस-पास परिक्रमावासियों के समूह अमरकंटक को तपस्थली के रूप में प्रतिबिंबित करते हैं। विश्व की एकमात्र सरिता जिसकी परिक्रमा की जाती है। कुंड से आगे निकलकर नर्मदा कल-कल बहने लगती है। लगभग छह किमी की यात्रा कर नर्मदा 100 फीट ऊंचा जलप्रपात बनाती है, जिसे कपिलधारा के नाम से जाना जाता है। हरे भरे वातावरण से घिरे इस झरने के आगे दूध धारा है, जो छोटा जलप्रपात है। यहां पर्यटक निडर होकर स्नान करते हैं।
जोहिला और सोन का भी होता है उद्गम
अमरकंटक से दो और नदियों का उद्गम स्थल है। एक जोहिला है तो दूसरी सोन। गंगा की सहायक सोन अपने उद्गम स्थल से लगभग सौ मीटर आगे इस ऊंची पर्वत चोटी से कई सौ फीट नीचे गिरती है। यह स्थान सोनमूढ़ा कहा जाता है जहां नीचे गांवों के घर छोटे-छोटे खिलौने जैसे दिखाई देते हैं।
अन्य प्रमुख स्थल
अमरकंटक के अन्य प्रमुख मंदिरों में भगवान शिव का त्रिमुखी मंदिर है। कल्चुरी शासक कर्ण देव महाचंद्र ने इस मंदिर का निर्माण कराया था। मंदिर में कलचुरी कालीन शिल्पकारों की बनाई आकृतियां सम्मोहित करती हैं। इन मंदिरों का संरक्षण वर्तमान में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) की देखरेख में हैं। माई की बगिया, जलेश्वर महादेव मंदिर और कबीर चबूतरा अन्य स्थानों को देखने के लिए लोग पहुंचते हैं।
ऐसे पहुंचें
अमरकंटक जबलपुर और बिलासपुर के निकट है। इन दोनों स्थानों के अलावा शहडोल से भी अमरकंटक सड़क मार्ग से पहुंचा जा सकता है।
हवाई मार्ग: निकटतम हवाईअड्डा जबलपुर में है यहां से अमरकंटक की दूरी 220 किमी है।
रेल मार्ग: जबलपुर-बिलासपुर ट्रैक पर पेंट्रा रोड स्टेशन अमरकंटक से सबसे समीपस्थ रेलवे स्टेशन है। बिलासपुर, अनूपपुर, कटनी और जबलपुर जंक्शन उतरकर भी अमरकंटक पहुंचा जा सकता है।
सड़क मार्ग: जबलपुर से वाया डिंडौरी अमरकंटक पहुंचा जा सकता है इसके अलावा शहडोल और बिलासपुर मार्ग से भी यहां पहुंचा जा सकता है। डिंडौरी से अमरकंटक की दूरी 80 किमी, शहडोल से 200 किमी तथा बिलासपुर से 117 किमी है। जबलपुर से डिंडौरी 140 किमी की दूरी पर है।
ठहरने की व्यवस्था
अमरकंटक में रुकने के लिए अच्छे होटल और सर्वसुविधा संपन्न आश्रमों के साथ-साथ होम स्टे सुविधा भी है। यहां मध्य प्रदेश टूरिज्म कार्पोरेशन का गेस्ट हाउस भी पर्यटकों की अच्छी आवभगत करता है।


