वो ख़्वाबों के दिन — एक प्रेम कहानी, अधूरी-सी ⭐
Episode 27

Episode – 27

मुझे मालूम था कि आप फोन करेंगे ही इसलिये बिना खाये पिये बस फोन के पास , जोगन
की तरह धूनी रमाये बैठी थी . फिर बिना वजह ज़ोर से हंस पड़ी . मैंने पूछा , यह क्या है ?
तुमने अद्भुत जवाब दिया , मैंने खुद से शर्त लगा रखी थी कि आप फोन ज़रूर करेंगे .
मैं जीत गई और वह हार गई . मैंने पूछ लिया , वह कौन ? फिर से हंसती हुई तुम बोली ,
तुम्हारे –मेरे भीतर का चोर .

दिले नादां चुप हुआ, दिल खोलकर रो रोकर
न जाने कौन है जो रातों में मुझमें छुपकर सिसकता है

अब मैं भी उदासी की खुमारी से बाहर आते हुए मस्ती में बोल पड़ा . चोर से क्यों
कॉम्पीटीशन करना पड़ा, इस डकैत को . खुले आम दिल की डकैती करने वाली को . तुम
मस्ती में झूमते हुए बोली , वही तो . मेरे मन के भीतर , अपने आप के प्रति , एक
शर्मिंदगी का भाव जागने लगा था. सोचती थी कि आप भी क्या सोचते होंगे मेरे बारे में ?
बड़ी बड़ी बातें करती थी , दोस्ती और प्यार के बीच के फर्क़ को स्पष्टता से बताने के लिये
और फिर खुद ही फिसल गई . मैं बीच में ही टोकते हुए बोला , फिसली नहीं बल्कि रपट
गई और मुझे भी साथ में रपटा लिया . तुम मुस्कुराई और बोली , हां वही . पर बताइये ,
मैंने कभी आपसे आमने सामने एक अच्छे दोस्त से ज़्यादा की नज़दीक़ी दिखाई ? नहीं ना .
तो बस , अब ऐसे ही चलने देते हैं . अब मैं थोड़ा सा संजीदा होते हुए बोला , क्या तुमको
ऐसा नहीं लग रहा है कि हम इस मीठी कसक की लालच में खुद को धोखा देने की कोशिश
कर रहे हैं ? आखिर यह कब तक चलेगा ? अब तुम भी लगभग रुंआसी सी होकर बोली ,
जानती हूं ‘जान’ , पर इस बार सचमुच मेरी जान पर बन आयी है . हम जब तक चला सकें

तब तक . अब थोड़े दिनों की तो बात है . हम कोशिश करते हैं कि आमने सामने हम केवल
अच्छे दोस्त रहें जिसे प्यार मोहब्बत से कोई सरोकार नहीं है . और चिट्ठियों व फोन में
आशिक़ – माशूक़ की तरह . मैं बोला , सचमुच , मेरा दिल भी यही चाह रहा था क्योंकि
हमारे रास्ते जल्द ही अलग अलग होने हैं . फिर ऐसा ना हो कि बिछुड़ने का दर्द , नासूर
बनकर हमें सताए . कितना भी ज़ोर लगा लें , अब हमारे बीच का सबकुछ इम्बैलेंस हो रहा
है . तुम फिर हंस पड़ी और बोली , तो जनाब आप अब ज़ोर लगाने लगे हैं , सबकुछ ठीक
करने के लिये . पर जो हो रहा है वह ख्वाब नहीं हक़ीक़त है . सो हमें मिलकर इस बात
का सामना करना ही पड़ेगा . ना जाने मुझे क्यों लगा कि तुम बाहर से हंस रही हो पर
अन्दर से रो रही हो . मैं टॉपिक बदलते हुए पूछ बैठा , वो सब तो छोड़ो , यह बताओ ,
आज मिठाई का रंग क्या है ? चहकते हुए तुमने जवाब दिया , नैवी ब्ल्यू स्कर्ट पर पीच
कलर का टॉप पहने हुई है तुम्हारी मिठाई . क्या तुम उसे देखना चाहोगे ? मैं भी हंसते हुए
बोला, सिर्फ देखना ही नहीं बल्कि अपनी नज़रों के भीतर बिठाना चाहूंगा . फोन रखकर मैं
तीर की तरह तुम्हारे घर की तरफ निकल पड़ा तुम्हारी एक झलक पाने को . मुझे अपने
फर्स्ट इयर में देखी एक फिल्म का एक गाना याद आ रहा था …

मैं जाऊं आगे ये ले जाए पीछे दिल मेरा ये अनाड़ी है
दिल दीवाना बड़ा मस्ताना , बड़ा पगला है, बड़ा बेगाना

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