Episode – 10
अगले दिन रविवार था. अल सुबह मेरे कदम फिर उसकी खिड़की की तरफ बढ़ने के लिए बेचैन
थे , एक रुटीन जो बन गया था. बड़ी मुश्किल से मैंने अपने रोका क्योंकि आज तो सीधे 10.30
बजे मुलाकात होनी थी , अपने मन पर राज करने वाली , मलिका से . रात भर जो मैं उसके
साथ छेड़ छाड़ , हंसी मज़ाक़ , रोमांस और ना जाने क्या क्या सोच रहा था ? सुबह से घबराहट
होने लगी कि उसे मैं ‘ दूर के ढोल सुहाने की तरह ‘ तो नहीं लगता हूं , कही वह पहली ही
मुलाकात में मुझे फ्यूज़ बल्ब ना मान ले . फिर खुद को दिलासा दिया कि कुछ तो खास है
माबदौलत में जो ‘ मलिका ‘ ने मुझसे मिलने की इच्छा दिखाई है . नहा धोकर चुपचाप फिर से
बिस्तर पर लेट गया , आंखें खोलकर देखता तो हर बार लगता कि समय इतना धीरे क्यों कट
रहा है ?
और कितने इम्तेहान लेगा वक़्त तू
ज़िन्दगी मेरी है फिर मर्ज़ी तेरी क्यों
9.30 बजे अपने सबसे स्टाइलिश कपड़ों के साथ , अपने को तैयार किया और चल पड़ा नेहरू
पार्क की उस जगह पर जहां उसने मुझे मिलने के लिये बुलाया था . मैं नेहरू पार्क स्विमिंग पूल
से निकले अपने साथियों के साथ गप मारते , उन्हें पार्क से बाहर तक छोड़ने आया . एक ने
झसे पूछ लिया कि इतने अच्छे कपड़े, क्या तुम्हारा जन्मदिन है ? मेरे ना कहने पर दूसरा बोला
, तो क्या आज एक दिन में ही किसी को इम्प्रेस करने का इरादा है ? हम सब ठहाका मार कर
हंस दिय सवा दस बजे , फिर से अंदर की तरफ भागा . नरम धूप थी और ठंडी हवा चल रही
थी , पर उस तरफ के बगीचे वाले हिस्से में कोई नहीं था . मैं एक झाड़ी के नीचे लेट गया .
फिर से उस खूबसूरत लमहे इंतज़ार करते हुए , अपनी सोच के ताने बाने बुनने लगा .
ग़ज़ब किया तेरे वादे पर ऐतबार किया
तमाम रात क़यामत का इंतज़ार किया
लगभग दस मिनट के बाद तुम , एक 12 साल की आया जैसी लड़की और एक 6 साल के
नन्हे मुन्ने का हाथ पकड़कर, दूसरे हाथ में क्रिकेट का बैट और स्टम्प लेकर आयी . वह बच्चा
भारी जोश में था और अपने हाथ की बाल को बार-बार उछलकर कैच करने की कोशिश करता
था . तुम लोगों ने स्टम्प लगाया और खेल शुरू कर दिया . तुम्हारी आंखें मुझे ढूंढ रही थीं .
मुझको देखते ही तुम्हारी नज़रों में खुशी तैर गयी. मैं भी एक अनजान युवा की तरह तुमसे
अनुरोध करने लगा कि मुझे भी खिला लो , मैं फील्डिंग में तुम लोगों की मदद करूंगा . तुमने
उस लड़की की तरफ देखा , वह खुशी से बोली, दीदी खिला लेते हैं ना ? शायद वह दूर तक दौड़
कर बार-बार बॉल लाने से बचना चाहती थी . 6 साल का बच्चा तुम्हारा भतीजा था . मैं उसे
धीमी बॉल करता , वह ज़ोर से मारता . मैं उसकी तारीफ़ करता और बॉल लेने जाता. फिर उस
लड़की की और उसके बाद तुम्हारी बैटिंग आयी. मैं जान-बूझकर कैच छोड़ता, उटपटांग हरकतें
और कमेंट कर, तुम लोगों को हंसाता. तुम सब, मुझसे हिलमिल कर, मज़े लेते. 20 मिनट
बाद तुमने कहा, बस , अब खेल ख़त्म करते हैं . बच्चे , उस लड़की और तुमने मुझे मुस्कुरा
कर बाय किया . उस बच्चे ने मुझसे अगले रविवार फिर खेल में शामिल होने का वायदा लिया .
फिर सामान और बच्चों के साथ तुम अंदर स्वीमिंग एरिया में चली गयी . मैं उदास होकर फिर
से उस झाडी के नीचे जाकर लेट गया .
वो करीब आये और अपने जलवे दिखाकर चल दिये
खेल गये मेरे अरमानों से , और सुला कर चल दिये
मैंने आंखें बंद की ही थीं कि पांच ही मिनट के अंदर मुझे मेरे कान में मीठी आवाज़ आयी, ‘ध्रुव
‘. वह मुस्कुराकर बोली, बुद्धु राम , कैसे सोच लिया कि मैंने आपको केवल फील्डिंग करने
बुलाया है ? झटपट उसने मुझे पार्क के दूसरे हिस्से में चलने कहा . जाते ही वह मेरा हाथ
पकड़कर एक झाड़ के नीचे बैठ गयी. मैं रोमांचित हो उठा . कुछ देर चुपचाप हाथों में हाथ रहा,
फिर हाथ छोड़कर बोली , सुनो आप . मैंने आंखों के इशारे से उससे कहा , आगे कहो.


