भारत चिनाब नदी की सहायक चंद्रा नदी के अतिरिक्त पानी को ब्यास नदी बेसिन की ओर मोड़ने के लिए चिनाब-ब्यास लिंक टनल परियोजना पर काम कर रहा है। मई 2026 में मंजूर इस परियोजना की अनुमानित लागत 2,352 करोड़ रुपये है। इसके तहत पीर पंजाल पर्वतमाला के नीचे करीब 8.7 किलोमीटर लंबी सुरंग बनाई जाएगी।
परियोजना के तहत हिमाचल प्रदेश के लाहौल-स्पीति जिले में चंद्रा नदी पर 19 मीटर ऊंचा बैराज बनाने की योजना है। इसके जरिए अतिरिक्त पानी को ब्यास बेसिन की ओर मोड़कर पेयजल, सिंचाई और जलविद्युत उत्पादन में इस्तेमाल किया जाएगा।
सिंधु जल संधि से क्या है कनेक्शन?
1960 में भारत और पाकिस्तान के बीच हुई सिंधु जल संधि के तहत सिंधु नदी प्रणाली की छह नदियों को दो हिस्सों में बांटा गया था। सिंधु, झेलम और चिनाब को पश्चिमी नदियां तथा रावी, ब्यास और सतलुज को पूर्वी नदियां माना गया था। संधि के अनुसार, पश्चिमी नदियों के पानी पर पाकिस्तान को मुख्य अधिकार मिले, जबकि पूर्वी नदियों के पानी का उपयोग भारत कर सकता है।
अप्रैल 2025 में पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने सिंधु जल संधि को स्थगित करने का फैसला लिया था। इसके बाद चिनाब-ब्यास लिंक परियोजना को लेकर पाकिस्तान की चिंताएं बढ़ गई हैं।
परियोजना का पाकिस्तान क्यों कर रहा विरोध?
पाकिस्तान का कहना है कि चिनाब नदी के पानी को ब्यास बेसिन की ओर मोड़ना सिंधु जल संधि का उल्लंघन हो सकता है। उसे आशंका है कि इस परियोजना से भारत को पानी के प्रवाह को नियंत्रित करने की अतिरिक्त क्षमता मिल सकती है। हालांकि, परियोजना का उद्देश्य भारत में सिंचाई, पेयजल और जलविद्युत उत्पादन के लिए अतिरिक्त पानी का उपयोग करना है।
हिमाचल, पंजाब और हरियाणा को होगा लाभ
इस परियोजना से हिमाचल प्रदेश के अलावा पंजाब और हरियाणा की जल आवश्यकताओं को पूरा करने में मदद मिलने की उम्मीद है। अतिरिक्त जल प्रवाह से निचले क्षेत्रों में स्थित जलविद्युत संयंत्रों को भी लाभ मिल सकता है। परियोजना के तहत बनने वाली सुरंग और बैराज के जरिए पानी को एक नदी बेसिन से दूसरे बेसिन तक पहुंचाने की व्यवस्था की जाएगी।


