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Sunday, February 8, 2026
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जानें हरिशंकर परसाई के लेखन के प्रभावशाली पहलू जो समाज को जागरूक करते हैं

हरिशंकर परसाई (1924–1995) हिंदी साहित्य के प्रसिद्ध लेखक और व्यंग्यकार थे। वे हिंदी साहित्य में अपने व्यंग्य लेखन के लिए विशेष रूप से जाने जाते हैं। उनकी लेखनी में सामाजिक और राजनीतिक स्थिति का गहरा आलोचनात्मक चित्रण होता था। परसाई का जन्म मध्य प्रदेश के होशंगाबाद जिले के बांद्राभान गांव में हुआ था।

जीवन परिचय:

  • जन्म: 22 अगस्त 1924, बांद्राभान, मध्य प्रदेश
  • मृत्यु: 10 अगस्त 1995
  • शिक्षा: उन्होंने हिंदी साहित्य में मास्टर डिग्री की थी और कुछ समय तक अध्यापन भी किया था।
  • लेखन शैली: परसाई का लेखन व्यंग्य, हास्य और गंभीर सामाजिक आलोचना का सम्मिलन था। उनकी अधिकांश रचनाओं में समाज में व्याप्त अंधविश्वास, भ्रष्टाचार, राजनीतिक विकृतियों, और व्यक्तिगत मुद्दों की आलोचना की गई है।

प्रमुख कृतियाँ:

  1. वह तिनका – यह उनकी प्रमुख व्यंग्य रचनाओं में से एक है।
  2. अंधा युग – यह रचनात्मक काव्य के रूप में एक महत्वपूर्ण काम है जिसमें महाभारत के युद्ध के बाद की स्थितियों का चित्रण किया गया है।
  3. सारिका – एक प्रमुख पत्रिका में उनके व्यंग्य प्रकाशित होते थे।
  4. दो बैलों की कथा – यह उनकी महत्वपूर्ण रचनाओं में से एक है जिसमें समाज और राजनीति की वास्तविकता को नकारात्मक रूप में प्रस्तुत किया गया है।

योगदान:

  • व्यंग्य साहित्य: हरिशंकर परसाई को हिंदी में व्यंग्य साहित्य का पितामह माना जाता है। उनके लेखन में समाज की समस्याओं और विकृतियों का विस्तार से विश्लेषण किया गया।
  • समाज सुधारक: परसाई ने अपने लेखन के माध्यम से समाज में सुधार की दिशा को बढ़ावा दिया। वे अंधविश्वास, धोखाधड़ी और पाखंड के खिलाफ थे।

हरिशंकर परसाई की रचनाओं ने हिंदी साहित्य में गहरी छाप छोड़ी और आज भी उनका कार्य समाज और राजनीति पर उंगली उठाने के लिए प्रेरणा स्रोत माना जाता है।

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