हिंदू धर्म ग्रंथों में कई ऐसी कथाएं हैं जो आश्चर्यचकित करती हैं और जीवन के लिए गहरा संदेश भी देती हैं। आज हम आपको एक ऐसी ही पौराणिक कहानी बता रहे हैं, जिसमें भगवान शिव की क्रोधाग्नि से उत्पन्न एक राक्षस (जलंधर) का बल इतना बढ़ गया था कि उसके विनाश के लिए देवों के देव महादेव को एक युक्ति (चाल) का सहारा लेना पड़ा।
कैसे हुई जलंधर की उत्पत्ति?
- महादेव का क्रोध: पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार भगवान शिव कामदेव पर अत्यधिक क्रोधित हो गए।
- क्रोधाग्नि का विसर्जन: संसार को भस्म होने से बचाने के लिए महादेव ने अपनी क्रोधाग्नि को समुद्र में डाल दिया।
- बालक का जन्म: इसी क्रोधाग्नि से समुद्र से एक बालक की उत्पत्ति हुई। उसके रोने की आवाज इतनी तेज थी कि पूरा संसार बहरा हो गया।
- नामकरण: तब ब्रह्मा जी ने उस बालक को अपनी गोद में उठाया और उसका नाम जलंधर रखा।
जलंधर का बल और वृंदा का पतिव्रता धर्म
बड़ा होकर जलंधर एक अत्यंत बलशाली राक्षस बना। उसका विवाह वृंदा से हुआ।
- वृंदा एक परम पतिव्रता नारी थी और असुर की पुत्री होने के बावजूद वह भगवान विष्णु की परम भक्त भी थी।
- वृंदा के पतिव्रता धर्म के कारण जलंधर की शक्तियां कई गुना बढ़ गईं, जिससे वह अजेय हो गया।
- शक्ति के घमंड में चूर होकर, जलंधर ने माता पार्वती को पाने की इच्छा की, जिसके कारण भगवान शिव और जलंधर के बीच भयंकर युद्ध हुआ।
- वृंदा के पतिव्रता धर्म के बल के कारण, भगवान शिव के लिए भी उस पर विजय पाना अत्यंत कठिन हो रहा था।
भगवान विष्णु की युक्ति और वृंदा का आत्मदाह
जब भगवान शिव के लिए युद्ध में जलंधर पर विजय पाना मुश्किल हो गया, तब भगवान विष्णु को एक युक्ति सूझी।
- विष्णु का छल: भगवान विष्णु ने जलंधर का रूप धारण किया और वृंदा के पास पहुँचे।
- धर्म भंग: वृंदा उन्हें अपना पति समझकर उनके साथ पति जैसा व्यवहार करने लगी। इस कारण वृंदा का पतिव्रता धर्म भंग हो गया।
- राक्षस का अंत: जैसे ही वृंदा का धर्म भंग हुआ, भगवान शिव ने जलंधर पर आसानी से विजय प्राप्त कर उसका वध कर दिया।
- तुलसी का जन्म: सत्य जानने के बाद वृंदा ने आत्मदाह कर लिया। उसकी राख से तुलसी का पौधा उत्पन्न हुआ। इस प्रकार, पतिव्रता वृंदा, तुलसी के रूप में पूजी जाने लगी।


