कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाई जाने वाली अहोई अष्टमी का व्रत माताएं अपनी संतान की दीर्घायु, सुख-समृद्धि और निरोगी जीवन की कामना से करती हैं। यह व्रत बहुत ही श्रद्धा, नियम और पवित्रता के साथ किया जाता है।
शास्त्रों में इस दिन कुछ कार्यों को करने का विशेष फल बताया गया है, वहीं कुछ कार्यों से बचने की भी सलाह दी गई है।
अहोई अष्टमी के दिन क्या करें (शुभ कार्य)
- स्नान व संकल्प करें: सुबह सूर्योदय से पहले स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें और संतान की मंगल कामना के लिए अहोई माता का व्रत संकल्प लें।
- अहोई माता की स्थापना: दीवार पर अहोई माता, उनके सात पुत्रों और सेई (साही) का चित्र बनाएं या स्थापित करें। पास में जल का कलश रखें और पूजन सामग्री तैयार करें।
- व्रत निर्जल या फलाहार रखें: यह व्रत आमतौर पर निर्जल (पानी के बिना) रखा जाता है, लेकिन स्वास्थ्य के अनुसार दिनभर फलाहार लिया जा सकता है। पूरे दिन अहोई माता का स्मरण करें।
- तारे की छांव में पूजन: शाम को जब आकाश में तारे दिखाई देने लगें, तब तारों की छांव में अहोई माता की पूजा की जाती है। यह व्रत का सबसे महत्वपूर्ण भाग है।
- तारे को अर्घ्य: इस समय महिलाएं तारे को माता अहोई का साक्षी मानकर दीप जलाती हैं, व्रत कथा सुनती हैं और जल अर्पित करती हैं। ऐसा करने से संतान की आयु बढ़ती है।
- व्रत कथा और आरती: अहोई माता की कथा श्रद्धा से सुनें और ‘जय जय अहोई माता’ की आरती करें। कथा सुनने से व्रत का पूर्ण फल प्राप्त होता है।
- संतान को आशीर्वाद दें: रात्रि में व्रत समाप्त कर अपने बच्चों को मिठाई खिलाकर आशीर्वाद दें। यह संतान के उज्ज्वल भविष्य का प्रतीक माना जाता है।
अहोई अष्टमी के दिन क्या न करें (वर्जित कार्य)
- नुकीली वस्तु का प्रयोग: पौराणिक मान्यता है कि इस दिन सुई-धागा, कैंची या कोई भी नुकीली वस्तु उपयोग में नहीं लानी चाहिए, इससे व्रत का फल कम होता है।
- क्रोध और कटु वचन: इस दिन मन, वचन और कर्म से पवित्रता बनाए रखें। क्रोध, विवाद या कटु शब्द बोलना व्रत की मर्यादा का उल्लंघन माना जाता है।
- जीव-जंतु को हानि: चूँकि अहोई माता की कथा में साही (सेई) नामक जीव का उल्लेख है, इसलिए इस दिन किसी पशु-पक्षी या कीट को भी नुकसान न पहुँचाएं।
- जमीन की खुदाई: इस दिन जमीन की खुदाई भी नहीं करनी चाहिए, क्योंकि यह जीव-जंतुओं को हानि पहुँचा सकता है।
- नकारात्मक विचार: अहोई अष्टमी व्रत का सार आत्मशुद्धि है। इसलिए किसी की निंदा या बुरा विचार मन में न लाएं और नकारात्मक सोच से दूर रहें।
- भोजन पकाना (व्रतधारी के लिए): जो महिलाएं व्रत रखती हैं, वे पूरे दिन भोजन न बनाएं और न ही खाएं। भोजन केवल रात में व्रत खोलने के बाद ही करें।


