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Monday, March 16, 2026
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शिव महापुराण में भगवान शिव ने बताया दुनिया का सबसे बड़ा पुण्य और पाप का रहस्य

शिव महापुराण हिंदू धर्म के पवित्र धार्मिक ग्रंथों में से एक है। इसमें भगवान शिव की महिमा और उपासना से जुड़ी चीजें हैं। हिंदू धर्म में तमाम वेद-पुराण हैं और इनमें से एक शिव महापुराण का बहुत ज्यादा महत्व है। इस महान ग्रंथ में कई ऐसी बातें लिखी हैं, जिसे पढ़कर समझ आएगा कि सृष्टि की शुरुआत कैसे हुई और पाप, कर्म, पुण्य जैसी बातें कहां से आईं? बता दें कि शिव महापुराण में दुनिया के सबसे बड़े पाप और पुण्य का जिक्र भी हुआ है।

क्या है पाप और पुण्य
शिव महापुराण के अनुसार सती के रूप में मां पार्वती का जन्म हुआ था। इनके जन्म के समय ही नारद मुनि ने तुरंत कहा था कि चाहे कुछ भी हो जाए उनका विवाह भगवान शिव के साथ ही होना है। बड़े होने के साथ-साथ भगवान शिव के प्रति उनका प्रेम गहराता ही गया। कई सालों की तपस्या के बाद आखिरकार भगवान शिव ने पार्वती मां को अपने साथ विवाद का वरदान दिया और आखिरकार दोनों की शादी हुई। बता दें कि एक बार मां पार्वती ने भगवान शिव से दुनिया के सबसे बड़े पुण्य और पाप के बारे में पूछा था। तब शिव जी ने सिर्फ एक बात कही थी- नास्ति सत्यात् परो नानृतात् पातकं परम्।।

क्या है इस श्लोक का मतलब
मां पार्वती के सवाल पर भगवान शिव ने जो श्लोक बोला उसका मतलब अब आसान भाषा में समझते हैं। इस श्लोक का मतलब है कि सम्मानपूर्वक जिंदगी जीना और हमेशा सच्चे रहना ही सबसे बड़ा गुण और पुण्य है। सबसे बड़ा पाप है बेईमानी करना या फिर ऐसे लोगों का साथ देना। एक इंसान को ऐसे ही कर्म करने चाहिए, जिसमें ईमानदारी और सच्चाई हो। इसके अलावा भगवान शिव ने मां पार्वती को ये भी कहा कि किसी को कभी भी ऐसे काम में शामिल नहीं होना चाहिए जहां पर लोगों के मन में और विचारों में गंदगी और पाप हो।

मोह है हर समस्या का कारण
भगवान शिव ने ये भी कहा कि कोई भी व्यक्ति जो भी भोग रहा है, वह उसके ही कर्मों का फल होता है। ऐसे में लोगों को अपने हर एक कदम का चुनाव बहुत ध्यान से करना चाहिए। भगवान शिव ने ये भी कहा कि हर एक समस्या का कारण हमेशा से मोह ही है। मोह ही ऐसी चीज है जो कई चीजों में बाधा डालती है। अगर कोई व्यक्ति इस चीज से मुक्त हो जाए तो वो दुनिया में कुछ भी हासिल कर सकता है। भगवान शिव ने ये भी कहा कि किसी तरह का लोभ भी व्यक्ति के दुखों का कारण है। लोगों को कर्म और शरीर बंधन के चक्र से मुक्ति पाने के लिए अपना सारा समय तपस्या और ध्यान में लगाना चाहिए।

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