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Monday, March 16, 2026
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वृंदावन के इस खास मंदिर में होता है कालसर्प दोष निवारण पूजा

भारत में कई ऐसे मंदिर हैं, जो किसी न किसी संकट या दोष की पूजा के लिए लाभकारी माने जाते हैं। इन्हीं में से एक मंदिर भगवान श्रीकृष्ण की लीला स्थल वृंदावन में मौजूद है। वैसे तो वृंदावन में भगवान श्रीकृष्ण को समर्पित कई मंदिर हैं। लेकिन वृंदावन के इस खास मंदिर में पूजा कराने से काल सर्प दोष से मुक्ति मिल जाती है। फिर कितना ही भयंकर कालसर्प दोष लगा हो या उसका प्रभाव कितना ही तीव्र क्यों न हो। वृंदावन के इस मंदिर में पूजा कराने से न सिर्फ कालसर्प दोष दूर होता है बल्कि उसका प्रभाव भी तेजी से घटना है और व्यक्ति को शुभ परिणाम मिलने लगते हैं। ऐसे में आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको वृंदावन के इस खास मंदिर के बारे में बताने जा रहे हैं।

काल सर्प दोष की पूजा
बता दें कि वृंदावन में भगवान कृष्ण के परम भक्त गरुड़ जी का एक मंदिर है। इस मंदिर को गरुड़ गोविंद के नाम से जाना जाता है। वहीं इस मंदिर का इतिहास काफी पुराना है। गरुड़ गोविंद का विशेष रूप से भगवान श्रीकृष्ण और उनके वाहन गरुड़ के प्रति श्रद्धा और प्रेम को व्यक्त करने के लिए समर्पित है। इस मंदिर में गरुड़ की एक बहुत बड़ी प्रतिष्ठित मूर्ति है।

गरुड़ गोविंद मंदिर में भगवान कृष्ण की मूर्ति है, जिसकी पूजा की जाती है। यह पूजा स्थल भक्तों के लिए फेमस है। हालांकि इस मंदिर के बारे में अधिकतर ब्रज लोगों को ही पता है। गरुड़ गोविंद मंदिर के बारे में बाहर के लोगों को कम जानकारी है। इस मंदिर को काल सर्प दोष की पूजा के लिए श्रेष्ठ माना जाता है।
धार्मिक मान्यता है कि जब यमुना में कालिया नाग ने अपना स्थान बनाया था। तब श्रीकृष्ण ने कालिया नाग का दमन कर यमुना से भगा दिया था। जिसके बाद श्रीकृष्ण ने गरुड़ को उस स्थान पर विराजमान रहने के लिए कहा था। जिससे कि कोई भी नाग ब्रज भूमि में प्रवेश न कर पाए। तभी से इस मंदिर में कालसर्प दोष की पूजा का विशेष महत्व है।

गरुड़ मंदिर में कालसर्प दोष की पूजा करने से इसका फल जरूर मिलता है। साथ ही कालसर्प दोष भी दूर होता है और व्यक्ति को नकारात्मक प्रभावों से छुटकारा मिलता है। इस मंदिर में भगवान कृष्ण और गरुड़ की एक साथ पूजा करने से व्यक्ति के जीवन से हर संकट का नाश हो जाता है। जिस तरह श्रीकृष्ण के हर कार्य में गरुड़ सहायक बनते हैं, वैसे ही वह अपने भक्तों पर भी कृपा बनाए रखते हैं।

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