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Sunday, February 8, 2026
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महात्मा गांधी के बारे में कुछ जानकारियां जिन्हें बहुत कम लोग जानते हैं


राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी का नाम हमारे देश का बच्चा बच्चा जानता है . लेकिन आजकल इनके नाम का सबसे ज़्यादा उपयोग राजनीति में किया जाने लगा है. कुछ लोग उनकी विरासत को राजनीतिक लाभ के लिये उपयोग करते हैं तो कुछ लोग उनकेकई अलोकप्रिय विचारों व निर्णयों को लेकर  विरोध करते हैं

इतने सब के बावजूद यह सच्चाई भी है कि पैसों व विचारों से इतने रईस ने अपना सबकुछ भारत की आज़ादी की लड़ाई के लिये दांव पर लग दिया था .  गांधी जी ने देश की आजादी के लिए अपना पूरा
जीवन दे दिया था लेकिन उन्होंने खुद कभी भी किसी लाभ के पद या किसी अन्य पद को
लेने से इनकार कर दिया था। 

आज हम आपको गांधी जी के बारे में जुड़े कुछ ऐसे तथ्यों से रूबरू करायेंगे जिनसे आप शायद ही अवगत हों :

अपनी मौत से एक दिन पहले महात्मा गांधी कांग्रेस पार्टी को भंग करने पर विचार कर रहे थे।

स्वतंत्रता दिवस की रात गांधी जी नेहरू जी का भाषण सुनने के लिए गांधी जी मौजूद नहीं थे, उस दिन गांधी जी उपवास पर थे।


महात्मा गांधी की अंतिम यात्रा 8 किलोमीटर लम्बी थी।
 महात्मा गांधी हर रोज 18 किलोमीटर पैदल चलते थे।इस लिहाज से गांधी जी पुरी दुनिया के दो चक्कर लगा सकते थे ।

महात्मा गांधी के पास कृत्रिम दांतों का एक सेट हमेशा मौजूद रहता था। इसे वे अपनी लंगोटी में लपेटकर चलते थे। जब उन्हें भोजन करना होता था, तभी उनका उपयोग करते थे। भोजन करने के बाद उन्हें अच्छी तरह से धोकर, सुखाकर फिर से लंगोटी में लपेटकर रख लेते थे।

 भारत की करेंसी में गांधीजी का फोटो अंकित है परंतु जिस अंग्रेजी सरकार के खिलाफ गांधीजी ने आंदोलन किया उसी अंग्रेजी सरकार ने महात्मा गांधी की मौत 21 साल बाद उनके सम्मान में स्टांप जारी किया था

 महात्मा गांधी ने आइंस्टीन, हिटलर, टॉलस्टॉय सहित कई विख्यात हस्तियों से मुलाकात की थी।

 ये आयरिश उच्चारण वाली अंग्रेजी बोलते थे। इसका एक मात्र कारण था कि शुरुआती दिनों में गांधीजी को अंग्रेजी पढ़ाने वाले अध्यापकों में से एक आयरिश व्यक्ति भी था।

लंदन यूनिवर्सिटी में पढ़ाई करके अटार्नी बने, लेकिन कोर्ट में पहली बार बोलने के प्रयास के दौरान उनकी टांगें कांप गईं। वे इतना डर गए कि निराशा और हताशा के बीच उन्हें बैठने पर विवश होना पड़ा। लंदन में उनकी वकालत बहुत ज्यादा नहीं चली। बाद में वे अफ्रीका चले गए। वहां उन्हें बड़ी संख्या में मुवक्किलों का मिलना शुरू हुआ।  द.अफ्रीका में वकालत के दौरान इनकी सालाना आय 15 हजार डॉलर तक पहुंच गई थी यानि लगभग 12 लाख रुपये अर्थात उस समय वे वहां के बेहद राईसों में से एक थे .

गांधी जी ने डरबन, प्रीटोरिया और जॉहिनसबर्ग में फुटबाल क्लब स्थापित करने में मदद की थी, जिनके नाम पैसिव रेसिस्टर्स सॉकर क्लब है।

महात्मा गांधी कभी अमेरिका नहीं गए, लेकिन वहां उनके कई प्रशंसक और अनुयायी बन गए थे। इन्हीं में से एक उनके असाधारण प्रशंसक प्रसिद्ध उद्योगपति और फोर्ड मोटर के संस्थापक हेनरी फोर्ड भी थे। गांधीजी ने उन्हें एक स्वहस्ताक्षरित चरखा भेजा था। द्वितीय विश्व युद्ध के भयावह समय के दौरान फोर्ड इस चरखे से सूत काता करते थे।

सविनय अवज्ञा (नाफरमानी) की प्रेरणा उन्हें अमेरिकी व्यक्ति की एक किताब से मिली। हार्वर्ड यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएट डेविड थोरियू नामक यह व्यक्ति मैसाचुसेट्स में एक संन्यासी की तरह जीवन बिताता था। उसने सरकार को टैक्स अदा करने से मना कर दिया, जिसके चलते उसे जेल भेज दिया गया। वहीं पर डेविड ने सविनय अवज्ञा पर एक किताब लिखी और लोगों को टैक्स न चुकाने की शिक्षा देने लगा। वहां पर लोगों ने उसकी किताब को गंभीरता से नहीं लिया, लेकिन भारत में वह किताब
गांधीजी के हाथ लग गई।

 उन्होंने इस रणनीति को आजमाने का विचार किया। उन्होंने देखा कि अंग्रेज अपने वायदे के खिलाफ भारत को आजादी नहीं दे रहे हैं, लिहाजा अंग्रेजी हुकूमत को सबक सिखाने के लिए उन्होंने लोगों से टैक्स देने के बजाय जेल जाने का आह्वान किया। इसके साथ उन्होंने विदेशी सामान के बहिष्कार का भी आंदोलन चलाया। जब ब्रिटिश हुकूमत ने नमक पर टैक्स लगा दिया तो गांधीजी ने दांडी यात्रा के तहत समुद्र तट पर जाकर खुद का नमक बनाया।

 अपने अहिंसा और सविनय अवज्ञा जैसे सिद्धांतों से राष्ट्रपिता ने दुनिया के लाखों लोगों को प्रेरित किया। शांति के नोबेल पुरस्कार विजेता कई विश्व नेताओं ने गांधीजी के विचारों से
प्रभावित होने की बात स्वीकारी है।

मार्टिन लूथर किंग जूनियर  (अमेरिका),   दलाईलामा  (तिब्बत), आंग सान सू की  (म्यांमार),   नेल्सन मंडेला  (दक्षिण अफ्रीका), एडोल्फो पेरेज इस्क्वीवेल (अर्जेंटीना) और अमेरिका के पूर्व  राष्ट्रपति बराक ओबामा ने इस सत्य को स्वीकारा है कि वे गांधी के विचारों एवं दर्शन से प्रभावित हैं।

 ये बात और है कि अपने विचारों और सिद्धांतों से नोबेल पुरस्कार विजेताओं को प्रभावित करने वाले महात्मा गांधी को इस पुरस्कार से वंचित रहना पड़ा। महात्मा गांधी को पांच बार नोबेल पीस प्राइज के लिए नामांकित किया गया था।

महात्मा गांधी की वजह से चार कॉटिनेंट और 12 देशों में सिविल राइट मूवमेंट शुरु हुआ था।

            प्रसिद्ध पत्रिका ‘टाइम’ ने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को तीन बार अपने कवर पेज पर स्थान दिया है। 1930 में गांधीजी को ‘मैन ऑफ द ईयर’ घोषित किया था। 1999 में पत्रिका द्वारा मशहूर भौतिक विज्ञानी अल्बर्ट आइंसटीन को ‘पर्सन ऑफ द सेंचुरी ’ चुना गया तो महात्मा गांधी
दूसरे स्थान पर रहे।

 महान भौतिक विज्ञानी अल्बर्ट आइंसटीन ने गांधीजी के बारे में एक बार कहा था, ‘ हमारी आने वाली पीढ़ियां शायद ही यकीन कर पाएं कि कभी हांड़-मांस का ऐसा इंसान (गांधीजी) इस धरती पर मौजूद था।

गांधी जी को सम्मान देने के लिए एप्पल के संस्थापक स्टीव जॉब्स गोल चश्मा पहनते थे।

गांधी जी के नाम से भारत में 53 मुख्य मार्ग हैं जबकि विदेशों में 48 सड़के हैं।

वैसे तो गांधी जी के बारे में कहने के लिये और भी बहुत कुछ है पर अभी इतना ही .

इंजी. मधुर चितलांग्या , संपादक , दैनिक पूरब टाइम्स

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