Total Users- 1,177,022

spot_img

Total Users- 1,177,022

Friday, March 20, 2026
spot_img

मकर संक्रांति : यह पर्व केवल परंपरा नहीं, बल्कि प्रकृति, परिश्रम और कृतज्ञता का महोत्सव है, जानें कहां कैसे मनाते हैं

मकर संक्रांति एक सूर्य से जुड़ी अनेक परंपराओं का महोत्सव है। सबको सूर्य चाहिए, क्योंकि इससे जीवन की तमाम जरूरतें पूरी होती हैं। ऐसे में, आध्यात्मिक रूप से ही नहीं, व्यावहारिक रूप से भी मकर संक्रांति का महत्व बहुत बढ़ जाता है। यह महापर्व अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग ढंग से मनाया जाता है।

यह भारतीय एकता का महोत्सव है। भारत की पहचान उसकी विविध परंपराओं में नहीं, बल्कि उन्हें जोड़ने वाली भावना में है। अलग-अलग स्वाद, अलग-अलग रीतियां और अलग-अलग उत्सव हैं, पर सूर्य एक ही है। उसका प्रकाश सबके लिए समान है। यही कारण है कि मकर संक्रांति केवल एक पर्व नहीं, बल्कि भारत की सामूहिक मुस्कान और साझा आशा है। यह ऐसा पर्व है, जो पूरे देश में प्रायः एक ही समय पर मनाया जाता है, पर इसके हर क्षेत्र में अलग-अलग रूप और रंग हैं। यह पर्व केवल परंपरा नहीं, बल्कि प्रकृति, परिश्रम और कृतज्ञता का महोत्सव है।

कृषि से जुड़ा पर्व
यह प्रकृति से जुड़ा पर्व है। इस समय देश के अधिकांश क्षेत्रों में फसल कटाई हो जाती है। कृषक समाज अपनी मेहनत का फल पाकर प्रकृति व सूर्य के प्रति आभार व्यक्त करना चाहता है। यह पर्व समाज के श्रम, संतोष और साझा खुशियों को प्रकट करता है।

एक पर्व, अनेक नाम
मकर संक्रांति के कई रूप हैं, तो कई नाम भी हैं। इसके नाम बदलते हैं, पर भावना एक ही रहती है। कर्नाटक में यह मिठास और सौहार्द का पर्व है। यह संबंधों को मजबूत करने का पर्व है। तिल, गुड़, मूंगफली और नारियल से बने पकवान विशेष रूप से तैयार किए जाते हैं। इन्हें पड़ोसियों और मित्रों में बांटकर मधुर व्यवहार दर्शाया जाता है। आंगन में रंगीन अल्पनाएं सजती हैं। हरी पत्तियों के साथ गन्ना घरों की शोभा बढ़ाता है। इस दिन पशुओं को भी सजाया जाता है, क्योंकि कृषि उनकी मदद से ही मुमकिन होती है।

तमिलनाडु में यह भोजन और समृद्धि का उत्सव है। यहां यह चार दिन चलने वाला महापर्व है। मिट्टी के पात्रों में नए चावल, दूध और गुड़ से विशेष व्यंजन पकाया जाता है और वह जब उफनता है, तब उसे समृद्धि और सौभाग्य का संकेत माना जाता है। यहां पशुओं की ही नहीं, उन खेतों की भी पूजा होती है, जो कृषि को संभव बनाते हैं।

केरल में यह परिवार और फसल का पर्व है। इस समय चावल की नई फसल की कटाई के बाद भगवान सूर्य और प्रकृति को धन्यवाद देने की परंपरा है। घरों में नारियल और गुड़ से बनी पारंपरिक मिठाइयां बनाई जाती हैं। लड्डू और हलवा बनता है। सभी मिलकर भोजन और प्रसाद पाते हैं।

आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में रंगों से सजे आंगन, पतंगों से भरा आकाश इसकी पहचान है। सुबह-सुबह घरों के सामने रंगीन अल्पनाएं बनाई जाती हैं। तिल, चावल और गुड़ से बने व्यंजन पकते हैं। बच्चों के हाथों में उड़ती पतंगें उत्साह का प्रतीक बन जाती हैं।

महाराष्ट्र में यह पर्व तिल और गुड़ की मिठास के माध्यम से सामाजिक सौहार्द का संदेश देता है। महिलाएं पारंपरिक रीति से पर्व मनाती हैं। घरों में विशेष भोजन बनते हैं और पतंगबाजी से परिवेश में उल्लास होता है।

More Topics

विधानसभा चुनावों से पहले बंगाल को अनुचित रूप से निशाना बनाया जा रहा – ममता बनर्जी

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने विधानसभा चुनावों...

श्रम विभाग की योजनाओं से श्रमिक बनेंगे आत्मनिर्भर, मिलेगा स्वरोजगार का अवसर

दीदी ई-रिक्शा एवं ई-रिक्शा सहायता योजना से होगा श्रमिकों...

छत्तीसगढ़ विधानसभा से पारित हुआ नगर एवं ग्राम निवेश (संशोधन) विधेयक 2026

छत्तीसगढ़ में सुनियोजित शहरी विकास को मिलेगी नई दिशा...

फसलचक्र परिवर्तन बना संजीवनी: बढ़ी आय, बचा पानी

कभी धान-प्रधान खेती के लिए पहचाने जाने वाले धमतरी...

आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ने की ताकत मिली- अमरिका बंजारे

महतारी वंदन योजना से ग्रामीण महिलाओं के जीवन में...

देश की एकता और धर्म के नाम पर हो रहा ध्रुवीकरण : स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद

बिलासपुर। शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद छत्तीसगढ़ की न्यायधानी बिलासपुर पहुंचे...

BSNL ने दो तिमाहियों में 280 करोड़ और 262 करोड़ रुपये का शुद्ध लाभ अर्जित किया -केंद्रीय संचार मंत्री सिंधिया

केंद्रीय संचार एवं पूर्वोत्तर क्षेत्र विकास मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया...

इसे भी पढ़े