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Monday, March 16, 2026
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फूल-फल नहीं, इस मंदिर में भक्त ले जाते हैं 5 पत्थर…माता को पसंद है चमरगोटा, जानिए क्या है मान्यता

देश भर में सैकड़ों ऐसे मंदिर हैं, जहां पर भक्त देवी-देवताओं को खुश करने के लिए सोना-चांदी और अन्य सामाग्री चढ़ाते हैं। वहीं, कुछ देवी-देवता ऐसे भी हैं, जिन्हें चढ़ावे के रूप में अलग-अलग वस्तु पसंद है। ऐसी वस्तुएं चर्चा का विषय बन जाती हैं। बिलासपुर में भी इसी तरह की देवी हैं, जिन्हें पत्थर पसंद है। खमतराई के मंदिर में भक्त पत्थर के चढ़ावे से देवी को खुश करते हैं। बिलासपुर के पास खमतराई गांव में स्थित बगदाई (वनदेवी ) मंदिर है। इस मंदिर में नवरात्र के समय श्रद्धालुओं की बड़ी संख्या पहुंच रही है।


यह मंदिर अनूठा है, इसका निर्माण तो अभी हाल के वर्षों में शुरू हुआ है, लेकिन इस स्थान पर लोगों की श्रद्धा काफी पुरानी है। लगभग 100 साल से भी ज्यादा देवी यहां विराजमान है। जब यहां जंगल हुआ करता था और जंगली जानवर घुमा करते थे। तब यहां से आने-जाने वाले लोग अपने घर या गंतव्य तक सकुशल पहुंचने के लिए पांच पत्थर रखकर मनोकामना मांगते हुए आगे बढ़ जाते थे, और सुरक्षित अपने गंतव्य तक पहुंचते थे। पहुंचने के बाद लोगों को बताते थे कि उन्होंने एक देवी के पास कुछ ऐसा किया। धीरे-धीरे लोगों को बगदाई वनदेवी के विषय में जानकारी हुई और लोग यहां आने लगे। बाद के वर्षों में यहां जब बस्ती बसी तो यहां पेड़ के नीचे रखी प्रतिमा के लिए आसपास के लोगों ने छोटी सी मंदिर का निर्माण कराया। मंदिर से जुड़े लोग और श्रद्धालुओं ने बताया कि 100 साल पहले से भी बगदाई वनदेवी यहां स्थापित है। तब से परंपरा चली आ रही है। लोगों ने पांच पत्थर रखकर अपनी मनोकामना की और यह परंपरा आज भी है।


लोगों का कहना है कि दूर-दूर से लोग आते हैं और उनकी मनोकामना बगदाई वनदेवी मंदिर में पूरी होती है। मंदिर आने वाले एक भक्त ने बताया कि देवी के चमत्कार की जानकारी होने पर वे यहां आए हैं। इन्हें देवी के दैवीय चमत्कारों की जानकारी लगी तो वह यहां आकर देवी से प्रार्थना करने लगे। उन्होंने कहा कि अब जो भी हो देवी उनका उद्धार करेगी तो वो वापस आएंगे। उन्होंने देवी की प्रतिमा के सामने पांच पत्थर रखे और अब उनकी मनोकामना पूरी होने पर वे दोबारा यहा पत्थर चढ़ाने आएंगे।


बगदाई वनदेवी के विषय में कहा जाता है कि वह स्वयंभू स्थापित हैं। लगभग सौ सालों से लोग यहां आ रहे हैं लेकिन किसी को यह नहीं मालूम है कि देवी की प्रतिमा कौन लेकर आया है और यहां कैसे पहुंची। कहते हैं कि पेड़ के नीचे ही लोगों को देवी की प्रतिमा दिखी थी। शुरुआती दौर पर तो कोई ऐसे ही प्रतिमा होने की सोच देवी की ओर ध्यान नहीं देता था।


बताया जाता है कि बाद में एक जमींदार को देवी ने स्वप्न देकर खुद के होने की जानकारी दी। धीरे-धीरे लोगों को देवी की चमत्कार की जानकारी लगने लगी और छोटे से मंदिर के रूप में निर्माण कराकर देवी को स्थापित कर दिया गया।

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