(इंदौर के श्री गोविंदराम सेक्सरिया इंजीनियरिंग कॉलेज में बिताये अपने खूबसूरत लम्हों को अपने दोस्तों व घटनाओं के साथ पिरोते हुए, पिछले हफ्ते रैगिंग के अनुभव के बाद मेरे “वो ख्वाबों के दिन” का पांचवा अंक )
सचमुच रैगिंग ने हम फर्स्ट इयर के हॉस्टल वालों को दोस्ती के नए अनुभव का मज़ा लेना सीखा दिया था . कई वीक एंड, मार से बचने हम नाइट शो जाते . फिर वहां से रेलवे स्टेशन चले जाते और दो-तीन बजे तक हॉस्टल लौटते. कभी कभी तो ट्रेन के कटे डब्बे में सो जाते थे . संतोष पतकी , रविंद्र मुले, नीलेंद्र सिंह चौहान , मुकेश श्रीवास्तव, राघवेंद्र नवरत्ने , सुनील दत्त , उदय सिंह इत्यादि एक साथ आठ दस लड़के होते थे तो खूब गप-शप और हंसी मज़ाक होती थी . फिर यह रूटीन हो गया था . जो हॉस्टल में रहते उन्हें रैगिंग की मार पिटाई मिलती थी . एक बार सीनियर वीक डे पर आ गए . बाकी लोग को छोड़ दिया और हम लोगों की खूब ठुकाई हुई . पर हम दोस्तों में प्रगाढ़ता बेहद बढ़ गयी थी. छत्तीसगढ़ से मेरी बैच में इंदौर इंजीनियरिंग करने आये पांच लोग और थे. मैं राजनांदगांव से, आर.बाबूराव, जॉन आइप(दल्ली राजहरा) , बिलासपुर से महेश अग्रवाल(बिल्हा), मित्रेश वर्मा (फागुरम) और राजिम से आनंद अग्रवाल. हम सब में से बाबुराव बेहद निष्कपट था. आनंद से मुलाकात भी बेहद अलग ढंग से हुई थी. वह भी लेट आया था. मैं कहीं बाहर से लौट रहा था तो देखता हूं, महेश व अशीष मज़ुमदार, दो लोगों के साथ होस्टल से बाहर निकल रहे है. मैंने देखा उन दोनो में से एक लम्बे बाल व बड़ी फ्रेम का चश्मा पहने लड़का लंगड़ाकर चल रहा है. दूसरे, वे अंकल लगातार उस आंखों से विरोध करते रुंआसे लड़के को समझाये जा रहे हैं . मुझे समझ पड़ा वे उसे नॉन वेज खाने की हिदायत दे रहे हैं . वैसे मेरे रूम पार्टनर हितेश परसाई के मज़ाकिया अंदाज़ से हम सभी प्रभावित थे. नीरज जैन (जो अगले चार साल मेरा पार्टनर रहा ) से उसकी बहुत पटती थी और मेरी नीरज के पार्टनर प्रसन्न मालू (दोनो सिवनी से थे ) से प्रगाढता. उसकी ज़बरदस्त बॉडी थी , वह सचमुच पहलवान था, काला और छै फुट का. ग्वालियर से आया अरुण त्रिपाठी भी बेहद दिलेर था, उसका पार्टनर बलिया से आया उमेश मिश्रा उतना ही सरल था. मैं, मालू व त्रिपाठी, तीनो की तिकड़ी बन गयी थी , जिनका ध्यान पढ़ाई से ज़्यादा अपने को हिम्मती साबित करने में रहता था. मालू की सोहबत में मैंने भी वेट लिफ्टिंग करनी चालू कर दी थी. मैं उसे वस्ताज़ (उस्ताद ) कहता और वह मुझे खलीफा. एसजीएसआईटीएस इंदौर की एक परम्परा थी कि यदि हॉस्टल के किसी की भी लड़ाई हो गयी तो पूरे बैच के लड़कों को मारपीट में हिस्सा लेने जाना पड़ता था, कोई बीमार हुआ तो उसको देखने रोज़ हर एक को पहुंचना ज़रूरी होता था. यदि कोई रुका तो उसकी बेहद धुलाई सीनियर करते थे. ऐसे में हम सभी हॉस्टल वाले एक दूसरे के बेहद करीब हो गए थे. वहां हॉस्टल आसपास की पांच टॉकीज रीगल, मिल्की वे, बेम्बिनो यशवंत और स्टारलिट (केवल सीनियरों के लिए ) टॉकीज़ में कॉलेज की जबरदस्त दादागिरी थी. वहीं ‘मिल्की वे’ में मेरी पहली बार राजीव बेदी के साथ देवेंद्र पालीवाल से मुलाकात हुई थी. उन टाकीज़ों को दहेज़ में आया कहकर कोई सक्सेरियन (हमारे कॉलेज के लड़के) कभी टिकिट नहीं खरीदता था. कभी भी जाता और कभी भी देखकर निकल आता था. हम जूनियर्स नीचे पिक्चर देखते क्योंकि ऊपर सीनियरों से सामना होने की संभावना होती थी. ‘अंखियों के झरोखे से’ पिक्चर को हमने बेम्बिनो में दसियों बार देखी और एक साउथ इंडियन पिक्चर ‘मीठी मीठी बातें’ हॉस्टल के किसी लड़के ने पचीस बार से कम नहीं देखीं होंगी .हर कोई गाता , मैं जाऊं आगे वो ले जाये पीछे दिल मेरा ये अनाड़ी है. एक दूसरे की चिंता-फ़िकर, एक दूसरे के दिल की बातें कहना सुनना, एक दूसरे की चीज़ें शेयर करना मैंने यहीं सीखा. यह अद्भुत अनुभव था. फर्स्ट इयर में कुछ माह के अंदर ही, सचमुच, एक दूसरे से जान की दोस्ती (एक दूसरे के लिए जान लुटाने की चाह ) हो चुकी थी .
(अगले रविवार अन्य अनुभव व लड़की सायकल वाली की बात )
मधुर चितलांग्या , संपादक , पूरब टाइम्स , भिलाई


