(इंदौर के श्री गोविंदराम सेक्सरिया इंजीनियरिंग कॉलेज व हॉस्टल में बिताये, अपने खूबसूरत लम्हों को, अपने दोस्तों व घटनाओं के साथ पिरोते हुए, मेरे वो ख्वाबों के दिन भाग – 3 )
मेरा रूम पार्टनर परसाई जैसे मेरे कॉलेज के पहले दिन का गाइड हो गया था. उस दिन सबसे पहले मेरी मुलाकात बालकृष्ण चौहान और दीपक महाजन से हुई थी. परसाई की उनसे दोस्ती थी. उसने मुझे पड़ोस के उदय सिंह, विजय कनौरिया और प्रभाकर वर्मा से मिलवाया. वह मेरे सेक्शन में ही था. सुबह सवेरे कॉलेज में उसने मुझे दो बिल्कुल अपनी तरह के छोटे परंतु प्यारे लड़कों से मिलवाया. दोनों में एक हंसोड़ था और एक धीर –गंभीर. वे अतुल रेगे और मुकुल मूले थे. अतुल कहीं रामबाग की तरफ रहता था और मुकुल किसनपुरा ब्रिज के पहले चौक पर पहले माले पर . मैं मुकुल के साथ बैठा और परसाई अतुल के साथ. मेरी मुलाकात उस दिन छत्तीसगढ़ से आये महेश अग्रवाल और मित्रेश वर्मा से हुई. महेश तेल कट बालों के साथ और मित्रेश अपनी नशीली आंखों में तिल के साथ. कई और लोगों से भी जान पहचान हुई. जिनमें सुनिल गुप्ता, जसजीत होरा इत्यादि थे. क्लास में सात लड़कियां भी थीं. पर माहौल बिल्कुल स्कूल की तरह था. दोपहर को हम पैदल रानीसराय होस्टल लौटे. हमारे साथ राजीव बेदी भी था. वह पहले से परसाई की पहचान का होशंगाबाद का था. दोस्ती क्या चीज़ होती है, यह हॉस्टल में रहने वाला बहुत बेहतर जान जाता है. पहले ही दिन एक बेहद मज़ाकिया रूम पार्टनर ‘हितेश परसाई’ पाकर मैं हैरान था. वह मेरे साथ कुछ इस तरह से व्यवहार कर रहा था जैसे कि मुझे बरसों से जानता हो. तरह तरह से मुंह बनाना और अपनी कोई बात बताकर ज़ोर-ज़ोर से हंसना, जैसे उसकी आदत थी. रास्ते में खाते हुए आये फिर दोपहर हम गप मारते हुए सो गए. शाम को मैं उठा तो देखा कि परसाई गायब है. जल्दी से मुंह धोकर मैंने एक अच्छी सी हाफ बांह की टीशर्ट पहनी. और सोचा अब फर्स्ट फ्लोर में आये फर्स्ट इयर के लड़कों से जान-पहचान कर आता हूं. ऊपर के कॉरिडोर में पहुंचा तो एक लड़का नज़रें नीची किये, ज़ोर से सल्यूट मारकर बोला, गुड इवनिंग सर. मैंने भी उसे गुड इवनिंग किया, वह अपने शर्ट की तीसरी बटन देख रहा था. मुझे अजीब लगा. इतने में दो और लड़के वहां से निकले. मुझे देखकर ठिठक गए और उन्होंने भी मुझे विश किया. सामने के कमरे से एक लड़के ने कमरा खोला. वह ठिठक कर वापस अंदर भागा और दो ही मिनट के अंदर फुल बांह की शर्ट पहन बाहर आया और विश कर सर नीचे कर खड़ा हो गया . सभी ने फुल शर्ट इन कर रखा था. मैंने कहा इतना क्यों घबरा रहे हो ? किसी ने कोई जवाब नहीं दिया . तब मैंने बताया कि आज ही मैंने हॉस्टल में एडमिशन लिया है और फर्स्ट इयर में हूं. तब उनमे से एक लड़का मुझे धकियाते हुए कमरे के अंदर ले जाकर, ज़ोर से बोला, फर्स्ट इयर में है और हाफ टीशर्ट. मरेगा साले और हमको भी मरवाएगा. यह अरुण त्रिपाठी था. उसने मुझे बताया कि फर्स्ट इयर वाले फुल शर्ट इन, सेकण्ड इयर वाले फूल शर्ट आउट, थर्ड इयर वाले शर्ट की बाहें फोल्ड कर पहन सकते हैं. फोर्थ इयर के बाद ही कॉलेज या हॉस्टल में खुले आम हाफ टी शर्ट पहन सकते हैं. मैं घबरा गया क्योंकि मैंने सिर्फ दो फुल शर्ट के अलावा बाकी आधी बांह के शर्ट, टी शर्ट ही लाये थे. रूम में सभी लड़के आ गए. फिर एक दूसरे से पहचान की. उमेश चंद मिश्रा, भूपेंद्र सिंह, अजय गोयल, भारत पांचाल, अरुण राजपूत इत्यादि लोग मिले. 2 घंटे बाद मैं नीचे आ गया. बाथरूम से परसाई के कपडे धोने और गाने की आवाज़ आ रही थी.
(अगले रविवार रैगिंग व अन्य अनुभव दोस्तों के साथ )
इंजी. मधुर चितलांग्या
1979-1984 Civil


