नई दिल्ली। संसद के शीतकालीन सत्र के दौरान सोमवार, 8 दिसंबर को लोकसभा में ‘वंदे मातरम्’ गीत के 150 साल पूरे होने के उपलक्ष्य में एक विशेष चर्चा शुरू हुई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस मौके को देश और संसद के लिए ऐतिहासिक बताते हुए, लगभग एक घंटे तक अपना संबोधन दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि ‘वंदे मातरम्’ सिर्फ एक गीत नहीं, बल्कि भारत की स्वतंत्रता यात्रा और राष्ट्रीय चेतना की आत्मा रहा है।
पीएम मोदी ने अपने संबोधन में औपनिवेशिक शासन, स्वतंत्रता संघर्ष और आपातकाल (इमरजेंसी) के दौर में ‘वंदे मातरम्’ की भूमिका पर विस्तार से चर्चा की।
📜 ‘वंदे मातरम्’ के साथ हुए ‘अन्याय’ पर सवाल
प्रधानमंत्री मोदी ने अपने भाषण का केंद्रीय बिंदु यह सवाल बनाया कि आखिर किन कारणों से ‘वंदे मातरम्’ के साथ “इतना बड़ा अन्याय” हुआ और क्यों इसे जानबूझकर हाशिये पर रखा गया।
उनका सीधा संकेत उन राजनीतिक ताकतों की ओर था, जिन्होंने तुष्टिकरण की नीति के चलते इस राष्ट्रगीत को विवादों में खींचा और इसे देश की एकता के बजाय विभाजन का मुद्दा बनाने की कोशिश की।
पीएम मोदी के भाषण की 10 बड़ी बातें
1. सजीव मंत्र, विजय का महामंत्र
पीएम मोदी ने कहा कि जब बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने ‘वंदे मातरम्’ की रचना की, तो यह स्वतंत्रता संग्राम का सबसे बड़ा पर्व बन गया। यह सिर्फ दो शब्द नहीं, बल्कि “सजीव मंत्र, विजय का महामंत्र” था, जिसने भारतीयों में साहस और आत्मविश्वास की नई लहर पैदा की। उन्होंने कहा कि यह ब्रिटिश राष्ट्रगान के खिलाफ बंकिम दा की लेखनी का जवाब था।
2. नेहरू की ‘बैकफुट’ पर आना और जिन्ना का विरोध
पीएम मोदी ने 1937 की घटना का जिक्र किया, जब मुस्लिम लीग ने मोहम्मद अली जिन्ना के नेतृत्व में “वंदे मातरम्” के खिलाफ राजनीतिक अभियान छेड़ दिया और इसे ‘हिन्दू-वर्चस्व का प्रतीक’ बताया।
- उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस अध्यक्ष जवाहरलाल नेहरू आधारहीन आरोपों का कड़ा जवाब देने के बजाय बैकफुट पर आ गए।
- नेहरू ने सुभाष चंद्र बोस को पत्र लिखकर जिन्ना की भावनाओं से सहानुभूति जताई और माना कि ‘आनंदमठ’ की पृष्ठभूमि के कारण यह गीत मुसलमानों को आहत कर सकता है।
- परिणामस्वरूप, कांग्रेस कार्यसमिति ने 26 अक्टूबर को फैसला लिया कि अब केवल पहले दो छंद ही गाए जाएंगे, बाकी हिस्सों को हटा दिया गया। पीएम मोदी ने इसे “साम्प्रदायिक सद्भाव” के नाम पर मुस्लिम लीग के दबाव में घुटने टेकना और राष्ट्रगीत की आत्मा को मारना बताया।
3. राष्ट्रगीत से विश्वासघात
मोदी ने कहा कि इतिहास के कठिन समय में कुछ राजनीतिक ताकतों ने राष्ट्रगीत को स्वीकार करने की बजाय उसका विरोध किया या उसे पीछे धकेला, जिसने आने वाली पीढ़ियों में भ्रम पैदा किया। उन्होंने ऐसे फैसलों को “राष्ट्रगीत से विश्वासघात” करार दिया।
4. ‘हम यहां इसलिए बैठे हैं…’
उन्होंने याद दिलाया कि ‘वंदे मातरम्’ सिर्फ एक गीत नहीं, बल्कि एक क्रांतिकारी नारा था। उन्होंने जोर देकर कहा कि अगर लाखों लोगों ने ‘वंदे मातरम्’ बोलते हुए आजादी की लड़ाई न लड़ी होती, तो आज सांसद स्वतंत्र रूप से इस संसद में चर्चा नहीं कर पाते।
5. औपनिवेशिक शासन के खिलाफ युद्धघोष
पीएम मोदी ने स्पष्ट किया कि ‘वंदे मातरम्’ केवल अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई का मंत्र नहीं था, बल्कि मातृभूमि की मुक्ति की पवित्र जंग का प्रतीक था, जिसने लाखों स्वतंत्रता सेनानियों के साहस और बलिदान का सम्मान किया।
6. 150 साल बाद भारत की प्रगति
उन्होंने कहा, “जब इस गीत के 50 साल हुए थे, तब देश गुलामी में था। 100 साल पूरे होने पर राष्ट्र आपातकाल से गुजर रहा था। लेकिन आज, 150 साल बाद भारत दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में तेज गति से आगे बढ़ रहा है।”
7. वैदिक युग की संस्कृति की याद
प्रधानमंत्री ने ‘वंदे मातरम्’ को वैदिक युग की संस्कृति से जोड़ा। उन्होंने कहा कि यह हमें वेदों के सूत्र “माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः” और भगवान राम के कथन “जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी” की याद दिलाता है।
8. इमरजेंसी के समय संविधान का गला घोटा गया
पीएम मोदी ने याद दिलाया कि जब ‘वंदे मातरम्’ के 100 साल पूरे हो रहे थे, तब देश इमरजेंसी की गिरफ्त में था। उन्होंने आरोप लगाया कि उस दौर में अभिव्यक्ति की आज़ादी खत्म कर दी गई थी और संविधान का गला घोटा गया था।
9. इतिहास का काला अध्याय
उन्होंने इमरजेंसी को भारत के इतिहास का काला समय बताया, जब संवैधानिक अधिकार छीन लिए गए। मोदी ने कहा कि आज संसद के पास अवसर है कि वह इतिहास की कमियों को ठीक करे और राष्ट्रगीत की गरिमा को मजबूत बनाए।
10. राष्ट्रीय गौरव और परंपरा का उत्सव
पीएम मोदी ने निष्कर्ष निकाला कि ‘वंदे मातरम्’ के 150 वर्ष पूरा होना सिर्फ एक समारोह नहीं, बल्कि राष्ट्रीय गौरव का क्षण है और उन बलिदानों को याद करने का अवसर है जिन्होंने देश को आज़ादी दिलाई।


