श्री गोविंदराम सेक्सरिया इंजीनियरिंग कॉलेज, इंदौर के रानी सराय हॉस्टल में हर सुबह अलसाई होती थी , भीषण ठण्ड , फिर भी खुशनुमा माहौल रहता था . सबसे ज़्यादा मज़ा आता था पहला पीरियड बंक कर सोने में. फिर भी मैं सिंसियर होने का भरसक प्रयास करता था. फर्स्ट इयर का रूम पार्टनर हितेश परसाई बेहद मज़ेदार था. व्यंगकार चाचा हरिशंकर परसाई की छाप थी उसपर. रात को वह मिन्नतें कर मुझसे सुबह जल्दी उठाने का वादा लेता पर सुबह नाना प्रकार के नखरे करता था . कभी मेरे उठने के पहले मेरे पलंग के नीचे छिपकर सोने की कोशिश करता तो कभी छोटे बच्चे की एक्टिंग करता कि मम्मी पहले दूदू पिलाओ , फिर मैं उठूंगा. एक दिन तो हद हो गयी . रात को किसी बात पर हम दोनों का झगड़ा हो गया था फिर भी सुबह जैसे ही मैंने उसे उठाने उसकी रज़ाई हटाई तो देखा कि वह नंग-धडंग पड़ा है और अपने ऊपर मेरे लिए एक चिट्ठी चिपका रखा है .’ खाता अपना, पीता अपना, पहनता अपना , जा नहीं खाता , जा नहीं पीता , जा नहीं पहनता , पड़ा रहूंगा यूं ही नंग धडंग .’ हंसते हुए मैंने उससे रात की बात की माफी मांगी तो वह इठलाते हुए बोला, आज मुझे गोदी पाकर कॉलेज ले चलो ना . परसाई और मैंने, पहली व्यंग की पोस्टर मैगज़ीन ‘ स्पैनर ‘ नाम से बनाई और कॉलेज के पोर्च पर चिपका दी . कुछ व्यंग आइडिया मेरे थे और कार्टून उसके . पता नहीं सीनियरों को किसने यह बात बता दी कि हमारी बेहद धुलाई हुई और हमारी पोस्टर मैगज़ीन ने दम तोड़ दिया . हितेश ने मेरे भीतर दबे छुपे कलाकार को बाहर निकाल दिया . नीरज जैन (जो आगे चार साल मेरा रूम पार्टनर रहा ) और परसाई अद्भुत कलाकार थे . उनकी कॉमेडी की टाइमिंग बहुत ज़बरदस्त थी . परसाई ने उसका पहला स्वरचित प्रेम गीत मुझे सुनाया था –
मेरी सहपाठिनी एक परकटी मैना , सुन्दर सा मुखड़ा और सुन्दर से नैना.
शुभ्र मन शुभ्र तन वो तो नूरजहाँ थी ,जान थी, मेरी जान थी पर मुझसे वो अनजान थी .
जाने कब होगी इस तोते की वो मैना ,सुन्दर सा मुखड़ा और सुन्दर से नैना.
उसकी अदाकारी , उसकी कलाकारी , उसके खुलेपन , उसके मस्त मौला अंदाज़ ने अपनी ज़िंदगी के बारे में मेरा
नज़रिया बदल दिया . बचपन से मैं केवल एक पढ़ाकू था जो नाटक,म्युज़िक, भाषण इत्यादि कला को भी प्रतिस्पर्धात्मक गंभीरता से लेता था. पर मैंने उन सभी का , या कहूँ , ज़िंदगी का भी आनंद और मज़े के साथ रस लेना सीख लिया . सचमुच, अद्भुत था मेरा कॉलेज, अद्भुत था मेरा हॉस्टल.’ प्रिय हितेश तुम कहां हो ? ‘ वे दिन मुझे बहुत याद आते हैं .
इंजी. मधुर चितलांग्या , सम्पादक, पूरब टाइम्स


