ललही छठ या हल षष्ठी यह व्रत संतान की लंबी उम्र की कामना के लिए किया जाता है। ललही छठ को हलषष्ठी भी कहा जाता है। इस दिन महिलाएं सुबह गौरी-गणेश के साथ कुश की पूजा करती हैं। माताएं बेटे की सलामती की भगवान से कामना करती हैं और व्रत का संकल्प लेती हैं। दोपहर के समय सभी महिलाएं पूजा की थाली लेकर एक जगह जाती हैं और इस व्रत की कथा पढती हैं। छट माता की पूजा में खिलौने भी रखे जाते हैं। दोपहर को हरछठ महारानी और ग्वालिन वाली कहानी पढ़ी जाती है। इस दिन भगवार श्री कृष्ण के बड़े भाई बलराम का जन्म भी हुआ था। इस दिन अन्न का त्याग किया जाता है। इस साल यह व्रत 14 अगस्त को रखा जाएगा।
पौराणिक कथा के अनुसार, एक ग्वालिन गर्भवती थी। उसका प्रसव काल नजदीक था, लेकिन दूध-दही खराब न हो जाए, इसलिए वह उसको बेचने चल दी। कुछ दूर पहुंचने पर ही उसे प्रसव पीड़ा हुई और उसने झरबेरी की ओट में एक बच्चे को जन्म दिया। उस दिन हल षष्ठी थी। थोड़ी देर आराम करने के बाद वह बच्चे को वहीं छोड़ दूध-दही बेचने चली गई। गाय-भैंस का मिला जुला दूध जो वो लोगों को दे रही थी, उसे उसने भैंस का दूध बताया। इस तरह वह गांव वालों को ठग रही थी। तभी एक किसान वहां हल जोतने आया। इस पाप के कारण झरबेरी के नीचे स्थित पड़े उसके बच्चे को किसान का हल लग गया। दुखी किसान ने झरबेरी के कांटों से ही बच्चे के चिरे हुए पेट में टांके लगाए दिए और चला गया।
ग्वालिन लौटी तो बच्चे की ऐसी दशा देख कर उसे अपना पाप याद आ गया। वह सोचने लगी कि यदि मैंने झूठ बोलकर गाय का दूध न बेचा होता और गांव की स्त्रियों का धर्म भ्रष्ट न किया होता तो मेरे बच्चे की यह दशा न होती। अतः मुझे लौटकर सब बातें गांव वालों को बताकर प्रायश्चित करना चाहिए। इसलिए गांव में घूम कर बता दिया कि उसने ठगी की। अब वह अपनी इस गलती का प्रायश्चित करना चाहती थी। उसने साथ साथ सभी को यह भी बताया कि इसके लिए उसे क्या सजा मिली? उसके सच बोलने पर सभी गांव की महिलाओं ने उसे क्षमा किया और आशीर्वाद दिया। बहुत-सी स्त्रियों द्वारा आशीर्वाद लेकर जब वह पुनः झरबेरी के नीचे पहुंची तो यह देखकर आश्चर्यचकित रह गई कि वहां उसका पुत्र जीवित अवस्था में पड़ा है। तभी उसने स्वार्थ के लिए झूठ बोलने को ब्रह्म हत्या के समान समझा और कभी झूठ न बोलने का प्रण कर लिया।


