रानी नेता हंस रहे हैं, पर ट्रंप को फर्क नहीं पड़ता. ट्रंप की स्थिति उस पड़ोसी की तरह है जो आपके घर में आग लगाकर खुद ही बाल्टी लेकर खड़ा हो जाए और कहे— “चलो, समझौता करते हैं कि आग कितनी ठंडी होनी चाहिए.” ये बिना शर्म वाली बहादुरी भी एक कला है, जो सिर्फ व्हाइट हाउस के महावीर को बखूबी आती है . जब ईरानी नेताओं ने उनका मजाक उड़ाया, तो ट्रंप ने उसे ‘पॉजिटिव फीडबैक’ समझ लिया. यह वैसे ही है जैसे कोई लड़का किसी लड़की को प्रपोज करे और वो उसे चप्पल दिखा दे, तो लड़का दोस्तों से कहे— “देखा! उसने मुझे अपने फुटवियर का ब्रांड बताया है, मतलब रिश्ता पक्का है . इधर ईरानी नेता हंसते-हंसते लोटपोट हैं, और ट्रंप अपनी रैली में कह रहे हैं— “वे मुझे बहुत प्यार करते हैं, बस बता नहीं पा रहे हैं. वैसे ट्रंप के पास सच का अपना एक निजी वर्जन है. वे जब झूठ बोलते हैं, तो इतने शोर के साथ कि खुद सच भी अपना पहचान पत्र दिखाने के लिए लाइन में लग जाए. वे आग में घी डालते हैं और फिर पूछते हैं— “अरे, ये कमरा इतना गरम क्यों है? चलिए एसी ठीक करने का समझौता करते हैं.” ईरानी नेता कह रहे हैं कि वे ट्रंप से बात नहीं करेंगे, पर उनकी नजरें हर वक्त फोन पर टिकी रहती हैं. ईरान की प्रतिक्रियाएं उस पुराने ज़मींदार जैसी हैं जिसकी ज़मीनें बिक चुकी हैं, पर मूंछों पर ताव देना नहीं भूलता . वे ट्रंप का मज़ाक उड़ाकर खुद को ‘सुपरपावर’ समझ रहे हैं, जबकि असलियत में वे उस दुकानदार की तरह हैं जो ग्राहक को भगा तो देता है, पर शाम को गुल्लक देखकर रोता है. और हमारी स्थिति यह है कि हम ना खुद पर भरोसा कर पा रहे हैं ना ही अपनी सरकार पर क्योंकि ईरान व अमेरिका की वादाखिलाफी के रवैये से हम यह मानने लगे हैं कि “कभी भी कुछ भी हो सकता है“ .
इंजी. मधुर चितलांग्या
व्यंगकार व संपादक
दैनिक पूरब टाइम्स


