कल दो लड़कों ने चाय की टपरी वाले से गरमा गरम चाय मांगी और देश की गिरती अर्थ व्यवस्था और छत्तीसगढ़ की राजनीति पर बात करने लगे . साथ ही वे देश की सरकार व प्रदेश की सरकार के कामकाज की समीक्षा कर रहे थे और मुफ्त रेवड़ी बांटने पर देश की अर्थ व्यवस्था पर असर के बारे में बात भी कर रहे थे . आज की परिस्थिति में चाय की टपरी पर बैठकर अर्थव्यवस्था व देश की जीडीपी (GDP) पर बात करना वैसा ही है, जैसे किसी की शादी में जाकर ‘परिवार नियोजन’ पर लेक्चर देना। ‘युद्ध , पेट्रोल के भाव , गैस टंकी की किल्लत या आईपीएल’ की बात छोड़कर ‘राजकोषीय घाटा’ बोलना चाय के स्वाद में नमक डालने जैसा था . युवकों को समझना चाहिए था कि देश की गिरती अर्थव्यवस्था की बात करना ‘नेगेटिविटी’ फैलाना है . तब टपरी पर बैठे अन्य युवकों का खून खौलना स्वाभाविक था. युद्ध और आईपीएल ने देश को दो गुटों में बांट दिया है, लेकिन अर्थव्यवस्था की बात करने वालों के खिलाफ दोनों गुट एक हो गए और उन दोनों लड़कों की जमकर सुताई कर दी. प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया कि वे दोनो युवक बड़ी मुश्किल से जान बचाकर भागने में सफल हुए . हमें इससे यह सबक मिलता है कि अगली बार जब चाय की टपरी पर जाएं, तो जेब में ‘इकोनॉमिक सर्वे’ नहीं, बल्कि ‘मैच शेड्यूल’ रखें. याद रखिए, चाय ठंडी हो सकती है, लेकिन युद्ध और आईपीएल पर आपकी बहस हमेशा गर्म रहनी चाहिए .
इंजी. मधुर चितलांग्या
व्यंगकार व संपादक
दैनिक पूरब टाइम्स


