पाँच राज्यों के चुनाव सर पर आ गए हैं . दल बदल , आरोप प्रत्यारोप के अलावा बड़े-बड़े नेताओं द्वारा हलके स्तर की बातें शुरू हो गईं हैं . इंसान की इस पैंतरे बाज़ी से आहत बंदरों ने कल नवा रायपुर मे कांफ्रेंस कर, विकास के उस सिद्धांत को खारिज कर दिया है, जिसके अनुसार आज का मनुष्य बंदरों से ही विकसित हुआ है। बंदरों ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, “हमने कभी जाति या धर्म के आधार पर डालियां नहीं बांटीं, फिर हमारा वंशज इतना ‘आरक्षण’ और ‘विभाजन’ प्रिय कैसे हो गया?” बंदरों ने आगे कहा कि हम न अतीत में इतने गिरे हुए थे, न आज हैं। आज हर जगह इंसान , आतंकवाद, झूठ, रेप, भ्रष्टाचार, जिस्मफरोशी और न जाने क्या-क्या करने में लगा है ? एक रिसर्च में अब यह देखा जा रहा है कि कहीं इंसान का विकास ‘कुर्सी’ नामक एक निर्जीव वस्तु से तो नहीं हुआ? क्योंकि जैसे ही इंसान को कुर्सी मिलती है, उसकी रीढ़ की हड्डी केंचुए जैसी लचीली हो जाती है। एक वैज्ञानिक ने, बाकायदा, बंदरों की इस बात की सत्यता चेक करने अनेक जानवरों से गुण मिलाने का तय किया . गुण मिलाने गया तो चकित रह गया ? उसे आदमी में लोमड़ी सी चतुराई , भेड़िये सी चालाकी, अजगर सी गड़प करने की क्षमता, सांप सा ज़हर, भैंस सा आलस, गेंडे सी मोटी चमड़ी, केंचुए सी रीढ़ की हड्डी, सूअर सी फितरत इत्यादि मिले. मैंने पत्रकार माधो को यह दुविधा सुनाई तो पत्रकार माधो बोले , हो सकता है, किसी भ्रष्ट ग्रह से कोई एलियन ग्रुप हनीमून मनाने , पीके की तरह , पृथ्वी पर आया हो और उनका वापसी वाला रिमोट खो गया हो . हम सब उन्हीं के वंशज हों . कुछ वैज्ञानिक अब “डार्विन” की किताब जलाकर नई किताब लिख रहे हैं— इंसान: एक अनसुलझी खराबी “
इंजी. मधुर चितलांग्या ‘ माधो
व्यंगकार व सम्पादक
दैनिक पूरब टाइम्स


