ईरान तालियां पीट रहा है क्योंकि उसने अमेरिका के कुछ विमानों और हेलीकॉप्टरों को आसमान से टपकाया , कुछ अमरीकी सैनिकों को मारा व घायल किया और दुनिया को ये दिखा दिया कि ‘चाचा सैम’ अजेय नहीं हैं. यह वैसी ही जीत है जैसे कोई साइकिल वाला मर्सिडीज़ को टक्कर मार दे और कहे—”देखो, उसकी हेडलाइट तो मैंने फोड़ ही दी! उधर ट्रम्प साहब अपनी अलग ही बांसुरी बजा रहे हैं . इजराइल के कंधे पर बंदूक रखकर उन्होंने न सिर्फ बड़े-बड़े चेहरों को रास्ते से हटा दिया, बल्कि ईरान की परमाणु क्षमता को भी ‘दिवाली के फुस्सी बम’ जैसा बना दिया. होर्मुज जलडमरूमध्य का रास्ता खुल गया है, तो ट्रम्प की व्यापारिक आत्मा वैसे ही तृप्त है. दुनिया इस युद्ध में इसलिए जीत गई क्योंकि उसे बिना सब्सक्रिप्शन के ‘लाइव एक्शन मूवी’ देखने को मिल गई. लोग घर में पॉपकॉर्न लेकर टीवी से चिपके रहे और युद्ध की विभीषिका का ऐसे आनंद लिया जैसे कोई वर्ल्ड कप का फाइनल देख रहा हो . इजराइल उस दोस्त की तरह रहा, जिसे पार्टी में बुलाया तो गया काम करने के लिए, लेकिन बिल भी उसी के नाम फट गया. अमेरिका की शह पर जी-जान लगा दी, और अब ‘बहती गंगा’ यानी लेबनान में हाथ धोकर हिजबुल्लाह को खदेड़ने में लगा है ताकि खाली हाथ घर न लौटना पड़े. पाकिस्तान , उस व्यक्ति की तरह रहा जिसे ‘क्रेडिट की भूख’ ऐसी है कि किसी का बच्चा पास हो तो बधाई ये देने पहुँच जाते हैं कि ” पास होने पर मिठाई की बात तो हमने की थी!” समझौते का श्रेय लेने की ऐसी दौड़ लगाई कि खुद ही हांफने लगे. भारत की तेल वाली कूटनीति, उस चतुर सयाने जैसी रही जो किसी शादी में दोनों नाराज़ पक्षों से रिश्ता निभाता है. कभी ईरान को फोन, कभी ट्रम्प को हेलो, तो कभी रशिया के साथ चाय पर चर्चा. दुनिया युद्ध में बारूद फूँकती रही और हम अपनी ‘तेल की धार’ बनाए रखने में मशगूल रहे. आखिर ‘स्मार्ट’ वही है जो आग के पास रहकर भी अपना हाथ न जलने दे और दीया भी जला ले!
इंजी. मधुर चितलांग्या “माधो”
व्यंगकार व संपादक
दैनिक पूरब टाइम्स


