हम मीडिया वालों के लिए आईपीएल क्रिकेट नहीं, बल्कि एक जासूसी उपन्यास जैसा है. जैसे – अगर किसी ने नाक खुजला ली, तो हेडलाइन बनती है— ‘क्या ड्रेसिंग रूम के माहौल से नाखुश हैं कप्तान? क्या प्रीति जिंटा की मुस्कान के पीछे कोई गहरा राज है ? क्रिकेट की खबरों के बीच अब ये ढूँढना मुश्किल है कि मैच किसने जीता और फ्लाइंग किस के कारण टीआरपी किसने ? जब कोई खिलाड़ी बल्ला छोड़ कर माइक पकड़ता है, तो उसकी विशेषज्ञता अलग ही स्तर पर होती है. पुराने खिलाड़ियों की कमेंट्री सुनकर लगता है जैसे वो बल्लेबाज बल्ले से नहीं, सीधे शब्दकोश से रन बना रहे हों . जैसे – “देखिए, अगर इस गेंद पर छक्का नहीं लगता, तो निश्चित रूप से बल्लेबाज बोल्ड हो सकता था . बल्लेबाज़ ने यहां हवा में शॉट खेलकर जोखिम लिया है, क्योंकि ज़मीन पर तो फील्डर खड़े थे. स्टूडियो में बैठे एक्सपर्ट्स की हालत उस ज्योतिषी जैसी होती है जिसकी भविष्यवाणी हर ओवर के बाद बदल जाती है. जैसे- “मैच से पहले जो एक्सपर्ट कह रहे थे कि पिच सूखी है और स्पिनर्स को मदद मिलेगी, वही विकेट गिरने के बाद कहते हैं—’मैने पहले ही कहा था कि यहां घास है और पेसर्स को स्विंग मिलेगी’. 19वें ओवर तक जो खिलाड़ी ‘फ्रेंचाईजी का गौरव’ था, आखिरी गेंद पर कैच छोड़ते ही वह ‘मैच फिक्सर’ और ‘टीम का बोझ’ बन जाता है. जहां रोमांच है, वहीं एक्सपर्ट लोगों को भी पानी पिला सकने वाले दर्शक भी हैं. स्टेडियम से हज़ारों मील दूर बैठा दर्शक खुद को धोनी का बाप समझता है. “अरे! ये बॉल बाहर निकल के मारनी थी… इसको किसने टीम में ले लिया?” यह राय वह व्यक्ति दे रहा होता है जो खुद सीढ़ियां चढ़ते वक्त हांफने लगता है, लेकिन उसे लगता है कि अगर वह मैदान पर होता तो बुमराह की यॉर्कर पर रिवर्स स्वीप मार देता.
इंजी. मधुर चितलांग्या “माधो”
संपादक व व्यंगकार
दैनिक पूरब टाइम्स


