अगर किसी रेस्टोरेंट में हम बैठें और वेटर से कहें , एक प्लेट गुजरा हुआ वक्त ले आओ. तो क्या हम उसे खरीद पाएंगे? बिल्कुल नहीं. वक्त दुनिया की इकलौती ऐसी चीज़ है जिसकी कोई ‘रिफिल’ नहीं होती. लेकिन जवाब में वेटर कहे कि आदरणीय , वह तो खत्म हो गया है. हां ! पछतावा बिल्कुल ताजा है, आप कहें तो ले आऊं ? सच में , यह पछतावा किसी गरम समोसे की तरह होता है, जो जितना ताज़ा होता है, उतना ही ज़बान (और रूह) जलाता है. अक्सर, हम अपनों से छोटी-छोटी बातों पर रूठ जाते हैं. अपने दोस्तों से भी अपने दिल का हाल, अपना उसके प्रति प्रेम नहीं कह पाते . यहां तक कि उससे किये गये बुरे व्यवहार या पीठ पीछे की गई बुराई की, माफी भी नहीं मांग पाते हैं . जब वह इंसान चला जाता है, तब हमें “गुज़रा वक्त” याद आता है. हम चाहते हैं कि काश एक बार गले लगकर उससे कहते मैं तुम्हारी दिल से कद्र करता हूं और तुम्हें चाहता हूं . हाथ मिलाकर माफी मांग लेते, लेकिन सिर्फ अपनी चूक से केवल “पछतावा” ही हाथ आता है. अगर हम “गुज़रे वक्त” का ऑर्डर देने के बजाय “आज के पल” का स्वाद लेना शुरू कर दें, तो भविष्य में “पछतावे” की थाली कभी नहीं परोसी जाएगी. अगली बार जब भी आप अकेले सोचते हुए बैठें, तो बीती हुई बातों का शोक मनाने के बजाय खुद मुस्कुराएं. अपने किसी दोस्त या प्रियजन को फोन करें और बतायें आप उसकी कितनी कद्र करते हैं . आप अपनी गल्तियों के लिये उससे दिल से माफी मांगें . क्योंकि जो बीत गया, वह ‘सोल्ड आउट’ है, और जो आने वाला है, उसकी बुकिंग अभी खुली है. इस तरह से आप , पछतावे का ऑर्डर कैंसिल करें और “वर्तमान” का आनंद लें और भविष्य की थाली में सुमधुर स्वाद भरें .
इंजी. मधुर चितलांग्या
संपादक , दैनिक पूरब टाइम्स


