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ब्रह्मा जी ने आत्मा को अमर और शरीर को नाश्वान क्यों बनाया

जन्म और मृत्यु एक दूसरे के पूरक हैं। प्रकृति ने शायद हमारे भावों को गहराई से समझकर ही हमें नाशवान बनाया है, हमारे जीवन को 70-80 साल में समेट दिया है,। आत्मा को निर्मल सूक्ष्म स्वरुप दिया और एक मन दिया जो हर जन्म की कहानी और भावों को अपने भीतर समेटे रखता है। ब्रह्मा जी ने मनुष्य की आयु निश्चित क्यों की, रहस्य को समझने वाला मुक्ति की ओर अग्रसर होता है।किंवदन्ति है कि जब सृष्टि का प्रारंभ हुआ तो लोग मरते नहीं थे, अमर जीवन जीते थे। जब धरती पर मृत्यु नहीं थी, तो धीरे-धीरे मनुष्य की जनसंख्या बढ़ने लगी और एक समय ऐसा आया कि पृथ्वी को यह बोझ उठाना मुश्किल हो गया। धरती के संसाधन समाप्त होने लगे। धरती माँ परेशान होकर ब्रह्माजी के पास गई और कहा, ‘प्रभु! मुझ पर इतना बोझ हो गया है कि मैं मनुष्य जाति को धारण नहीं कर पा रही हूं, आप कुछ उपाय करें।’ इस पर ब्रह्मा जी ने सभी के कल्याण हेतु मनुष्य की आयु एवं असीमित जीवन अवधि को सीमित करने का निर्णय लिया।

शरीर मरण धर्म है और आत्मा अमृत तत्व - ब्रह्मा जी ने देवी पृथ्वी को बताया, ‘अब केवल मनुष्य के शरीर के अन्दर विद्यमान आत्मा ही अमर रहेगी और शरीर नाश्वान रहेगा।‘ मनुष्यों को उनके कर्म अनुसार स्वर्ग, नरक, पुनर्जन्म, विभिन्न प्रकार की योनियां अथवा मोक्ष की प्राप्ति होगी। तब से प्रत्येक मनुष्य की आयु उनके कर्मों के अनुसार निश्चित हुई जिसमें उसकी जीवन शैली, विचार, क्रियाकलाप, ग्रह-नक्षत्र आदि की भूमिका निश्चित की गई। पूर्व कर्मों के अनुसार मृत्यु का कारण रोग, दुर्घटना आदि से बचने के लिए मनुष्य को शुभ कर्मों की प्रेरणा वेद, पुराण, धर्मशास्त्रों के माध्यम से समय-समय पर ऋषियों के मुख से श्रुति और स्मृति के माध्यम से प्रदान की गई। किंवदन्ती अनुसार इस प्रकार न केवल पृथ्वी पर अपितु समूचे ब्रह्माण्ड में जन्म- मृत्यु, पुनर्जन्म, मोक्ष, शरीर के शुभ अशुभ कर्म अनुसार, परिणाम आत्मा को मिलने लगा।विद्वानों के अनुसार अगर मनुष्य का शरीर आज भी पृथ्वी पर अमर होता तो हज़ारों वर्षों में इस जीवन की अनगिनत वस्तुओं, परिस्थितियों और सुखों को भोग कर मनुष्य इतना ऊब जाता कि खुद को एक पिंजरे में हमेशा-हमेशा के लिए कैद मान लेता। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार अगर व्यक्ति विश्व का राजा भी बन जाए तो भी कुछ वर्षों में मनुष्य को राजसुख भी नीरस लगने लगता है। कितनी ही हमें सुख सुविधाएं मिल जाएं, कुछ ही समय में हम ऊब जाते हैं, नए की चाह सताने लगती है। इस प्रकार शरीर की अमरता का वरदान अभिशाप साबित हो सकता था।

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