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2050 में यह होगा हमारी धरती पर, बच्चों पर पड़ेगा क्लाइमेट चेंज का असर

गर्मी के असर से तनाव बढ़ेगा, प्री टर्म बर्थ बढ़ेंगे, हमारी सोचने की क्षमता घटेगी  1850'900 जिसे प्री-इंडस्ट्रियल युग के नाम से जाना जाता है, तब से लेकर 2020 तक पृथ्वी की सतह के तापमान में औसतन 1.1 डिग्री सेल्सियस (लगभग 2 डिग्री फारेनहाइट) की वृद्धि हुई है। जीवाश्म ईंधन के उपयोग से हुए कार्बन डाइऑक्साइड और अन्य ग्रीनहाउस गैसों के वातावरण में आने का यह प्रभाव है। यह वार्मिंग 2000 से अधिक वर्षों के रिकॉर्ड में अभूतपूर्व है। ये गर्मी तनाव बढ़ाएगी, जिससे हृदय की समस्याओं और स्ट्रोक का खतरा बढ़ जाएगा। प्री-टर्म जन्म और शिशु मृत्यु दर में वृद्धि होगी। सोचने की क्षमता भी प्रभावित होगी।

अधिक वर्षा से हर साल ढाई लाख मौतें बढ़ जाएंगी, डेढ़ करोड़ लोग प्रभावित होंगे बढ़ी हुई गर्मी के कारण वाष्पीकरण बढ़ेगा। इसलिए अधिक वर्षा होगी। कुछ स्थानों पर बहुत ज्यादा बारिश होगी तो कहीं बारिश बहुत कम हो जाएगी। ग्रीनपीस ईस्ट एशिया की रिपोर्ट के अनुसार, 2030 तक समुद्र के स्तर में अत्यधिक वृद्धि और तटीय बाढ़ से सात एशियाई शहरों में कम से कम 1.5 करोड़ लोग और 1,829 वर्ग किलोमीटर भूमि प्रभावित हो सकती है। 2030 से 2050 के बीच कुपोषण, मलेरिया, दस्त और गर्मी के तनाव से प्रति वर्ष लगभग ढाई लाख अतिरिक्त मौतें हो सकती हैं। पेट और आंतों की बीमारियां बढ़ेंगी।

पिघलती बर्फ से समुद्र में एिसड बढ़ेगा इससे समुद्री जीवों पर खतरा और अधिक होगा वातावरण में कार्बन डाई ऑक्साइड सहित ग्रीन हाउस गैसों में वृद्धि हुई हैं, जो समुद्र में घुल रही हैं। इससे महासागर अधिक अम्लीय हो रहे हैं। अम्लीकरण से समुद्री जीव-जंतुओं को खतरा होता है क्योंकि यह इन जीवों जैसे मूंगों, सीप, शंख आदि में कवक का निर्माण करना अधिक कठिन बना देता है। यह खाद्य शृंखला को बाधित कर सकता है, इसके मछली पकड़ने वालों के लिए व्यापक परिणाम हो सकते हैं।

क्लाइमेट चेंज का बच्चों पर असर

  • 2040 तक चार में से एक बच्चा अत्यधिक पानी की कमी वाले क्षेत्रों में रह रहा होगा।
  • 2050 जलवायु संकट के कारण 2.4 करोड़ बच्चे कुपोषण का शिकार होंगे।
  • 2050 तक जलवायु संकट के कारण 14.3 करोड़ लोग और प्रवासी हो सकते हैं।
  • 2030-2050 के बीच कुपोषण, मलेरिया, दस्त और गर्मी जैसी बीमारियां बच्चों में बढ़ जाएंगी।
  • 3.8 करोड़ बच्चों की शिक्षा बाधित होती है हर साल जलवायु संकट से।

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