• 19-04-2024 18:27:24
  • Web Hits

Poorab Times

Menu

रेन वॉटर हार्वेस्टिंग के लिए भारत सरकार के प्रयास और चुनौतियाँ

  • पृथ्वी का लगभग 71 फीसदी हिस्से पर पानी ही है। इसके अलावा 1-6 फीसदी पानी जमीन के नीचे है। यानि इतना सब होने पर भी सबसे मुश्किल वस्तु है पानी। पृथ्वी की सतह पर जो पानी है उसमें से 97 फीसदी महासागरों में है, जोकि नमकीन होने के कारण पीने योग्य नहीं है। मात्र 3 फीसदी पानी ही पीने योग्य है जिसमें से 2.4 फीसदी पानी उत्तरी और दक्षिणी ध्रुवों के ग्लेशियरों में जमा हुआ है। कमोवेश यह भी पीने के लिए सुलभ नहीं है। अब बचता है मात्र 0.6 फीसदी पानी। वहीं जिसे पीने के लिए प्रयोग में लाते हैं, जोकि नदियों, झीलों और तालाबों में है।

भारत सरकार के प्रयास - शहरी विकास पर संसदीय समिति ने साल 2015 में पेश अपनी रिपोर्ट में सिफारिश की था कि केंद्र सरकार के सभी कार्यालय और रिहायशी भवनों पर रेन वॉटर हार्वेस्टिंग सिस्टम लगाया जाना चाहिए। समिति ने यह भी कहा था कि इससे संबंधित अपडेटेड आंकड़ा तैयार किया जाए। इससे पहले 2013 में जारी रिपोर्ट में भी समिति ने यही सिफारिश की थी।
नीति आयोग के अनुसार, रेन वॉटर हार्वेस्टिंग को जल संरक्षण और भूजल को रिचार्ज करने का एक सरल, व्यवहारिक और पर्यावरण के अनुकूल तरीका माना जाता है। ऐसे में देश के कई राज्यों में रेन वाटर हार्वेस्टिंग को अनिवार्य बना दिया गया है। शहरी विकास मंत्रलय के मुताबिक प्रति 100 स्क्वायर मीटर क्षेत्र की छत से हर साल 55,000 लीटर तक जल का संरक्षण किया जा सकता है। मध्य प्रदेश में 140 वर्गमीटर या उससे अधिक क्षेत्रफल पर निर्मित होने वाले सभी भवनों में रेनवाटर हार्वेस्टिंग को अनिवार्य बना दिया गया है।
इसी प्रकार राजस्थान में सभी सरकारी भवनों में रेनवाटर हार्वेस्टिंग करवाना अनिवार्य कर दिया गया है। दिल्ली, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, बिहार, कर्नाटक और आन्ध्र प्रदेश में भी नई इमारतों में कानूनन, रेनवाटर हार्वेस्टिंग को अनिवार्य बना दिया गया है। कर्नाटक में रेनवाटर हार्वेस्टिंग करवाने पर सम्पत्ति कर में 5 वर्ष तक के लिये 20 प्रतिशत की छूट मिलती है।
 

रेन वॉटर हार्वेस्टिंग से जुड़ी चुनौतियाँ- बारिश का पानी काफी हद तक साफ होता है, लेकिन अगर वातावरण में प्रदूषण है, तो वर्षा जल के भी प्रदूषित होने का खतरा रहता है। अगर बारिश के पानी को ठीक तरीके से इकठ्ठा और जमा नहीं किया गया, तो भी इसके प्रदूषित होने का खतरा रहता है। इस वजह से कई चुनौतियां उठ खड़ी होती हैं। भारत के शहरों में प्रदूषण का स्तर बेहद खराब रहता है और इस बात की पूरी आशंका होती है कि इस प्रदूषण का बारिश के पानी पर भी बुरा प्रभाव पड़े। इसी तरह, इमारतों की छतें, या जहां बरसात का पानी जमा होता है। जैसे कि, गîक्के या खाली जमीन। वो जगहें भी धूल, चिडि़यों की गंदगी, कीड़ों और कचरे की शिकार होती हैं। अगर, इन अशुद्धियों को पाइप, पानी जमा करने के टैंक या गîक्कों में जाने से नहीं रोका जाता, तो पानी की गुणवत्ता तो खराब हो ही जाती है, और गîक्के या टैंक भी तलछट से भरने का खतरा रहता है।
इकठ्ठा किए गए बारिश के पानी में जिंक या सीसे की मिलावट भी हो जाती है। इसका कारण छतों पर लगी धातुओं, पाइप या टैंक से रिसाव होता है। अगर ऐसी अशुद्धियों वाला पानी पीने में इस्तेमाल होता है, तो सेहत की गंभीर समस्याएं पैदा हो सकती हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) का कहना है कि, ‘बारिश की पहली बौछार में आमतौर पर कीटाणु ज्यादा पाए जाते हैं और जैसे-जैसे आगे बारिश होती है, तो उसमें प्रदूषण की मात्र कम होती जाती है। वहीं पानी जमा करने के लिए बने टैंक अगर खुले हैं, तो वहां मच्छरों की भारी आबादी जमा हो जाती है।
बारिश के पानी में इन खनिजों जैसे कि कैल्शियम और मैग्नीशियम की कमी होती है। इनकी कमी से पानी का स्वाद भी अलग हो जाता है। बिना खनिज मिलाए, ये पानी पीना भी इंसान की सेहत के लिए नुकसानदेह हो सकता है।

Add Rating and Comment

Enter your full name
We'll never share your number with anyone else.
We'll never share your email with anyone else.
Write your comment
CAPTCHA

Your Comments

Side link

Contact Us


Email:

Phone No.