कोलकाता। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में अब केवल तीन सप्ताह शेष हैं। 294 सीटों वाली विधानसभा के लिए 23 अप्रैल और 29 अप्रैल को दो चरणों में मतदान होना है। ऐसे में आज सुप्रीम कोर्ट में एसआईआर (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन) प्रक्रिया से जुड़ी सुनवाई पर सबकी नजरें टिकी हैं। यह सुनवाई न्यायिक अधिकारियों द्वारा संशोधित मतदाता सूची जमा करने की अंतिम तिथि के साथ मेल खा रही है।
अनुच्छेद 142 के तहत हस्तक्षेप
20 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 142 के तहत अपनी असाधारण शक्तियों का प्रयोग करते हुए राज्य सरकार और चुनाव आयोग के बीच “विश्वास की कमी” को दूर करने की कोशिश की थी। अदालत का उद्देश्य था कि एसआईआर प्रक्रिया को पटरी पर लाया जाए, किसी भी वैध मतदाता का नाम सूची से न हटे और पूर्ण न्याय सुनिश्चित किया जाए।
हालांकि, एक महीने से अधिक समय बीतने और कई आदेशों के बावजूद स्थिति पूरी तरह स्पष्ट नहीं हो पाई है। अंतिम एसआईआर सूची में हटाए गए 60 लाख नामों में से लगभग 33 लाख नामों को बहाल किए जाने की संभावना जताई जा रही है, जबकि करीब 27 लाख नाम सूची से बाहर रह सकते हैं। अब तक निपटाए गए लगभग 55 लाख मामलों में 45 प्रतिशत बहिष्करण दर चिंता का कारण बनी हुई है।
न्यायिक अधिकारियों की तैनाती
सुप्रीम कोर्ट ने कलकत्ता हाई कोर्ट को 530 न्यायिक अधिकारियों की टीम गठित करने का निर्देश दिया था, जिसे बाद में बढ़ाकर 700 कर दिया गया। इनमें ओडिशा और झारखंड से 200 अतिरिक्त अधिकारी शामिल किए गए। इन अधिकारियों को मतदाता पंजीकरण अधिकारियों की भूमिका देते हुए लंबित दावों और आपत्तियों का निपटारा करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है।
अपीलीय प्रक्रिया पर अनिश्चितता
निर्णय प्रक्रिया के बाद 19 अपीलीय न्यायाधिकरणों के माध्यम से अपील की विस्तृत प्रक्रिया होनी है। लेकिन इसकी समयसीमा और कार्यप्रणाली को लेकर स्पष्टता नहीं है। ऐसे में यह सवाल उठ रहा है कि क्या चुनाव से पहले सभी आपत्तियों का समाधान हो पाएगा या नहीं।
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने हाल ही में भाजपा पर चुनाव में देरी कराने का आरोप लगाते हुए राष्ट्रपति शासन की आशंका जताई थी। वहीं मालदा में न्यायिक अधिकारियों को कथित रूप से बंधक बनाए जाने की घटना ने स्थिति को और संवेदनशील बना दिया है।
पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त का सुझाव
पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस.वाई. कुरैशी ने जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 का हवाला देते हुए सुझाव दिया है कि यदि नया संशोधन समय पर पूरा नहीं होता, तो पिछली वैध मतदाता सूची तब तक लागू रह सकती है जब तक एसआईआर प्रक्रिया पूरी नहीं हो जाती। उन्होंने यह भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट लंबित आवेदनों वाले मतदाताओं को मतदान की अनुमति देने पर विचार कर सकता है, बशर्ते अपीलीय न्यायाधिकरण उचित समय पर अंतिम निर्णय दें।
चुनाव नजदीक आते ही कानूनी और प्रशासनिक हलकों में इस मामले को लेकर सरगर्मी तेज हो गई है। अब सभी की निगाहें सुप्रीम कोर्ट के अगले कदम पर टिकी हैं, जो चुनावी प्रक्रिया की दिशा तय कर सकता है।


