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सच्ची मित्रता की प्रेरणा श्रीकृष्ण-सुदामा से लें, मित्र का साथ कभी न छोड़ें, फ्रैंडशिप डे पर संतों के विचार

मित्रता का धर्म है कि अपने मित्र को हमेशा गलत मार्ग में जाने से रोकें और अच्छे मार्ग में जाने की सलाह दें।

रायपुर। विश्वभर में अगस्त के पहले रविवार को फ्रैंडशिप डे मनाया जाएगा। इस दिन स्कूलों में बच्चे, छात्र-छात्राएं अपने मित्र को फ्रैंडशिप बेल्ट बांधेंगे। इसका अर्थ है कि बच्चे, युवा अपनी मित्रता को हमेशा के लिए निभाने का संकल्प लेंगे।

फ्रैंडशिप डे यानी मित्रता दिवस के महत्व को दर्शाते हुए राजधानी के भागवताचार्य कहते हैं कि भारतीय परंपरा में सनातन काल से मित्रता को खास महत्व दिया गया है। हिंदू धर्म ग्रंथों में उल्लेखित है कि मित्रता ऐसी निभाएं कि वह मिसाल बनकर रह जाए। केवल दिखावे की मित्रता नहीं करनी चाहिए। मित्र यदि संकट में हो तो उसका हर कदम पर साथ देना चाहिए। मित्र का साथ कभी न छोड़ें।

कृष्ण ने खाए थे मित्र सुदामा के दिए कच्चे चावल

द्वारकापीठ एवं ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती के शिष्य ब्रह्मचारी डा.इंदुभवानंद महाराज का कहना है कि हजारों साल बाद भी द्वारका के महाराजा श्रीकृष्ण और निर्धन सुदामा की मित्रता की मिसाल आज भी दी जाती है।

श्रीकृष्ण द्वारका के महाराजा थे और सुदामा गरीबी में जीवन गुजार रहे थे। स्वाभिमानी सुदामा ने कभी मित्र से मदद नहीं मांगी। श्रीकृष्ण से मिलने गए तो भेंट में कच्चे चावल ले गए। उसे भी श्रीकृष्ण ने चाव से खाया। बिना मांगे सुदामा को धनधान्य देकर समृद्ध कर दिया। इससे हमें सीख मिलती है कि मित्र की मदद करें तो उस पर अहसान न जताएं। मित्रों का साथ कभी न छोड़ें। यदि मित्र संकट में हों तो उसका साथ दें। बुरे कर्मों में लिप्त मित्रों से नाता न रखें और हमेशा अच्छे मित्रों की संगत में रहें।

मित्र को गलत मार्ग में जाने से रोकें

पुरी पीठ के शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती के शिष्य भागवताचार्य नंदकुमार चौबे का कहना है कि मित्रता का धर्म है कि अपने दुख से दुखी ना होकर सदैव अपने मित्र के दुख में दुखी हो। हमारा स्वयं का दुख पहाड़ जैसा बड़ा क्यों ना हो और मित्र का दुख धूल के समान कम हो। फिर भी हमें अपने पहाड़ जैसे दुख की परवाह किए बगैर अपने मित्र के छोटे से छोटे दुख का समाधान पहले करना चाहिए।

मित्र के गुणों की प्रशंसा करें और उनके अवगुण को किसी के सामने न बताएं। अपनी शक्ति और सामर्थ्य के अनुसार मित्र की सहायता करें। शास्त्रों में भगवान श्रीराम- सुग्रीव, कृष्ण- सुदामा, कर्ण-दुर्योधन की मित्रता प्रसिद्ध है। मित्रता का धर्म है कि अपने मित्र को हमेशा गलत मार्ग में जाने से रोकें और अच्छे मार्ग में जाने की सलाह दें। मित्र यदि किसी भी पक्ष में कमजोर दिखे तो उसे सहयोग देकर अपने जैसा शक्ति संपन्न बना देना चाहिए।

मित्रता में स्वार्थ न हो

भारतीय परंपरा को विदेशियों ने अपनाया और अब हमारे युवा विदेशी परंपरा के पीछे भाग रहे। हमारी प्राचीन संस्कृति में मितान बनने की परंपरा चली आ रही है। एक बार किसी को मितान बना लिया तो उसके हर सुख, दुख में साथ दिया जाता है। गांवों में आज भी यह परंपरा निभाई जाती है जो पीढ़ी दर पीढ़ी चलती है। मित्रता स्वार्थ के लिए नहीं करनी चाहिए।

निस्स्वार्थ भाव से मित्रता हो। बचपन की मित्रता को जीवन पर्यंत निभाएं। बचपन में सब एक बराबर होते हैं लेकिन सरकारी उच्च पद और बड़े उद्योगपति बनने के बाद लोग अपने मित्रों को भूल जाते हैं। असली मित्र वही है जो दुनियाभर की दौलत पाने के बाद भी अपने गरीब मित्र को अपने पास बिठाएं और एक-दूसरे के दिल की बातों को सुनें।

 

 

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