• 23-02-2024 23:09:31
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पद छोड़ने के बाद ज्ञानी हरप्रीत का पहला बयान:बोले- दमदमा साहिब का भी ले लो कार्यभार; वल्टोहा दिलेर तो उन्हें बना दें जत्थेदार

श्री अकाल तख्त साहिब का पद छोड़ने के बाद ज्ञानी हरप्रीत सिंह ने मीडिया के सामने आकर खुद पद छोड़ने की बात कही। उन्होंने कहा कि वह खुश हैं, वह तो ऑस्ट्रेलिया जाने से पहले दोनों तख्तों का पदभार छोड़ने की बात कह कर गए थे। वहीं बीते दिनों विरसा सिंह वल्टोहा के श्री अकाल तख्त साहिब के जत्थेदार पद पर की गई टिप्पणी पर वह काफी गुस्से हुए।जत्थेदार ज्ञानी हरप्रीत सिंह ने कहा कि शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (SGPC) ने उनसे यह पद नहीं छीना है। उन्होंने ऑस्ट्रेलिया जाने से पहले चीफ सेक्रेटरी से पद छोड़ने की बात कही थी। वह दमदमा साहिब का तख्त छोड़ने के लिए भी तैयार थे और दोनों तख्तों पर योग्य गुरसिख को बैठाने की बात कही थी। उन्होंने कहा कि वे अब भी तख्त श्री दमदमा साहिब का पदभार छोड़ने को तैयार हैं।वहीं ज्ञानी हरप्रीत सिंह ने स्पष्ट किया कि राघव चड्‌ढा की इंगेजमेंट में जाने से कोई दूरियां नहीं बढ़ी हैं। राघव चड्‌ढा व परिणीति चोपड़ा की सगाई में जाना कोई बड़ी बात नहीं थी।

विरसा सिंह वल्टोहा को लगा दो जत्थेदार
ज्ञानी हरप्रीत सिंह ने इस दौरान अकाली दल के सीनियर नेता विरसा सिंह वल्टोहा के बयान की भी निंदा की। उन्होंने कहा कि उन्हें वल्टोहा के बयान की जानकारी मिली थी। उन्होंने अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर लिखा था कि श्री अकाल तख्त साहिब का जत्थेदार बनने के लिए कथावाचक, ग्रंथी या विद्वान होना जरूरी नहीं है। जत्थेदार को सिर्फ दिलेर होना चाहिए।उन्होंने SGPC से मांग की कि विरसा सिंह वल्टोहा को ही श्री अकाल तख्त साहिब का जत्थेदार बना दें। वह बहुत दिलेर हैं।

रघबीर सिंह को दी शुभकामनाएं
ज्ञानी हरप्रीत सिंह ने इस दौरान ज्ञानी रघबीर सिंह को कार्यभार संभालने व श्री अकाल तख्त साहिब का जत्थेदार बनाए जाने पर शुभकामनाएं दी। उन्होंने कहा कि तकरीबन पौने 5 साल उन्होंने इस तख्त की सेवा की है और गुरुओं ने अब उन्हें यह मौका दिया है।

सरकारों का गुरुद्वारा एक्ट में दखल देना गलत
ज्ञानी हरप्रीत सिंह ने कहा कि गुरुद्वारा एक्ट 1925 में सरकारों का दख्त देना ठीक है या नहीं, यह कानून के विद्वान ही बता सकते हैं, लेकिन जितना उन्हें पता है कि तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू व एसजीपीसी मास्टर तारा सिंह के बीच एक समझौता हुआ था। जिसमें साफ कहा गया था कि एसजीपीसी की अप्रूवल के बिना इस एक्ट में संशोधन नहीं किया जा सकता।

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