• 28-02-2024 18:29:31
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बड़े नेता को क्रिकेट-मैच के 2 दिन बाद मिले पास:हार के डर से मंत्री ने बंगला खाली किया, ‘सास’ की मौजूदगी में ‘बहू’ से फीडबैक

कंजूसी को लेकर अगर चर्चा छेड़ी जाए तो अनंत है। हर किसी के अपने अपने अनुभव और ढेरों किस्से सामने आ जाएंगे। कंजूसी के अनेकों किरदार हर दौर में चर्चित रहे हैं। प्रदेश के मुखिया इन दिनों अपने साथियों की 'डिजिटल कंजूसी' से परेशान हैं। अब 'डिजिटल कंजूसी' का मामला भी समझ लीजिए। पिछले दिनों शहर में सत्ताधारी पार्टी के नेता चुनावी मंथन के लिए जुटे। प्रदेश के मुखिया ने चुनावी जीत का दावा करने वाले सर्वे का जिक्र करने के साथ पीड़ा भी जाहिर की। मुखिया को दर्द इस बात का है कि जिन योजनाओं के भरोसे चुनाव जीतने के दावे किए जा रहे हैं, उनके बारे में मंत्री,विधायक ट्वीट तो छोड़िए रीट्वीट तक नहीं करते।कार्यक्रम में तो सबने बात सुनी, लेकिन उस बात को इस कान से सुनकर उस कान से निकाल दिया। अब भी मुखिया के ट्वीट को मंत्री, विधायक रीट्वीट नहीं कर रहे।इसे ही 'डिजिटल कंजूसी' कहा गया है। मंत्री, विधायकों की डिजिटल कंजूसी ही पर्सेप्शन का सबसे बड़ा सैंपल सर्वे है।

पास में फेल : बड़े नेता को मैच खत्म होने के बाद दो दिन बाद पहुंचाए पास

हमारे यहां क्रिकेट का जादू सिर चढ़कर बोलता है। जब भी मैच होता है तो पास विवाद का मुद्दा बन जाते हैं। पास को लेकर तरह तरह के किस्से सामने आ रहे हैं जिन्हें सुनकर हंसी और गुस्सा साथ-साथ आ जाए तो भी कोई ताज्जुब नहींं। पिछले आईपीएल मैच में पास के कई ऐसे विवाद हुए जो अभी बाहर नहीं आए हैं। अब क्रिकेट पर सत्ता का ही कब्जा है तो बोले भी कौन लेकिन मंत्री,विधायक तक जिस तरह के अलंकारों का प्रयोग इस बार कर रहे हैं उससे साफ जाहिर होता है कि मैनेजमेंट और माइंड सेट दोनों बुरी तरह गड़बड़ाए हुए हैं। प्रदेश के मुखिया के धुर विरोधी नेता तक पास तो पहुंचाए, लेकिन मैच के दो दिन बाद।यह तो शादी खत्म होने के बाद न्योता देना जैसा हुआ। इसे सियासी बदतमीजी भी कह सकते हैं। ऐसे हाल कई मंत्री विधायकों के भी हैं।सत्ताधारी पार्टी में किसी से भी मैच का जिक्र छेड़कर देख लीजिए, जिस तरह के अलंकार निकलकर आते हैं , उससे तय है कि सियासी शिष्टाचार नहीं निभाया जा रहा।

मंत्री ने अचानक सरकारी बंगला खाली करने का फैसला क्यों किया?

प्रदेश के सौम्य छवि वाले मंत्रीजी ने अचानक सरकारी बंगला खाली करने का फैसला करके चौंका दिया है। मंत्रीजी अब अपने प्राइवेट मकान में शिफ्ट हो रहे हैं। सिविल लाइंस के बंगले से मालवीय नगर सामान पहुंचा दिया है। धार्मिक प्रवृति के मंत्रीजी का अचानक चुनावी साल में बंगला खाली करने पर तरह तरह की चर्चाएं हैं। जितने मुंह उतनी बातें हो रही हैं। कोई चुनावी साल में होने वाले तबादला वालों की भीड़ से बचने से जोड़ रहा है तो कोई शकुन-अपशकुन का एंगल निकाल रहा है। इस बंगले के साथ ऐसे संयोग जुड़े भी रहे हैं। बंगला खाली करने का असली कारण खुद मंत्रीजी ने भी अभी गोपनीय ही रखा है।

लाइन ऑफ नो कंट्रोल : ब्यूरोक्रेसी की मुखिया ने कैंप में क्या कहा नेताओं और अफसरों की अपनी अपनी भूमिका और साफ लक्ष्मण रेखा है। इस लक्ष्मण रेखा को लांघने पर या तो टकराव होता है या फिर बदनामी होती है।डिजिटल युग में सत्ताधारी पार्टी के लाइन लगाकर लाभार्थी बनाने वाले अभियान की वाजिब वजहों से आलोचना भी हो रही है।अभियान की जिस दिन शुरुआत हुई, उस समारोह में प्रदेश के मुखिया से लेकर मंत्री ओर बड़े अफसर शामिल हुए। मुखिया ने लोगों से संवाद किया तो छवि चमकाने वाली एजेंसी ने फोटो शूट भी रखा।पर्दे के पीछे होने वाला रिहर्सल जनता के सामने ऑन कैमरा हो गया। ब्यूरोक्रेसी की मुखिया ने लाभार्थियों से कह दिया कि इन योजनाओं का जाकर प्रचार करना। ब्यूरोक्रेसी के मुखिया की यह लाइन विपक्षी नेताओं ने पकड़ ली है। एक अफसर का यह लाइन बोलने का ब्लंडर आप समझ गए होंगे। ब्यूरोक्रेसी के मुखिया का दो महीने बाद ही रिटायरमेंट है अन्यथा विपक्ष हमलावर होने वाला था।अब सबको अपनी अपनी भूमिका और लक्ष्मण रेखा का ध्यान रखना ही होगा, अन्यथा विवाद झेलना होगा। इस घटना के बाद यह भी सुगबुगाहट है कि रिटायरमेंट के बाद ब्यूरोक्रेसी की मुखिया को भी कोई न कोई पद मिलने वाला है।

संगठन मुखिया का कार्यकर्ताओं पर ताना

प्रदेश के मुखिया और सत्ताधारी पार्टी के संगठन मुखिया की सियासी जोड़ी खूब जम रही है। दोनों महंगाई राहत कैंप में सरकार रिपीट की मृग-मरीचिका की तलाश में प्रदेश का कोना-कोना नाप रहे हैं। कर्म करने से ही फल मिलता है, लेकिन इसमें कई टर्म एंड कंडीशन हैं। कर्म की भी टाइमिंग बहुत अहम होती है। दोनों मुखिया पिछले दिनों राजधानी के पास एक गांव में पहुंचे। प्रदेश के मुखिया जब गांव में गए तो मिलने के लिए पार्टी कार्यकर्ता भी आगे आने लगे। जब होड़ सी मचने लगी तो संगठन के मुखिया ने कार्यकर्ताओं को मुट्ठी भर बताकर ताना मारा।संगठन मुखिया की डायलॉग डिलीवरी के बीच ही प्रदेश के मुखिया सामने आ गए और मामला वहीं का वहीं रुक गया। इस डायलॉग-डिलीवरी का वीडियो बन गया जिसमें साउंड से लेकर हाव भाव सब साफ नजर आ रहा है।

कलेक्टर रहते 800 से ज्यादा जमीनें अलॉट कीं सबकी जांच
एनसीआर के जिले में कलेक्टर रहे एक एसीबी ट्रैप आईएएस अफसर के कारनामे अब सामने आ रहे हैं। भोलाराम का जीव बनी फाइलें जब सरपट दौड़ें तो समझ जाना चाहिए कि कुछ हुआ है।पड़ताल में सामने आया कि एसीबी ट्रैप होने से पहले कलेक्टर ने 800 से ज्यादा जमीनें अलॉट की उन आवंटनों को सरकार अब रद्द कर रही है। रेवेन्यू डिपार्टमेंट पूरी जांच कर रहा है और रोज अलॉटमेंट कैंसिल हो रहे हैं।हद तो तब हो गई जब नई तहसील बनाने के लिए चिन्हित जमीन भी कलेक्टर ने किसी को अलॉट कर दी थी। अब पुराने कलेक्टर के समय अलॉट हुई जमीनों पर तलवार लटक गई है।एसीबी ट्रेप हो चुके अफसर रिटायर हो चुके हैं और इन दिनों विपक्षी पार्टी के कार्यकर्ता बन चुके हैं।

तेजतर्रार अफसर की घर वापसी की तैयारी

प्रशासन और राजनीति में सूटेबिलिटी, बॉन्डिंग जैसे शब्दों का बहुत महत्व है। सरकार बनते ही सबसे बड़े दफ्तर में मुखिया की टीम में शामिल रहे एक अफसर लंबे समय से सचिवालय से बाहर हैं। सत्ता के सबसे बड़े दफ्तर के अफसर से अनबन ने उन्हें सचिवालय से बाहर करवा दिया।अब तल्खी गायब हो चुकी है, तेजतर्रार अफसर को सचिवालय में लाने की पूरी तैयारी हो चुकी है। राजभवन में तैनात एक अफसर भी अब कतार में हैं। पहले सेंट्रल डेपुटेशन पर जाने की तैयारी थी लेकिन वहां मामला सुटेबल नहीं लगा तो अब रणनीति बदल गई हैं

सास,ननद की मौजूदगी में बहू से फीडबैक का क्या मतलब?
सत्ताधारी पार्टी में पिछले दिनों विधायकों से लिए गए वन टू वन फीडबैक पर अब प्रदेश के मुखिया के विरोधी खेते ने सवाल उठाना शुरू कर दिया है।मुखिया विरोधी नेता के समर्थक विधायकों ने नए सह प्रभारियों से लेकर कई लेवल तक फीडबैक के तरीके पर ही बुनियादी सवाल उठा दिए।युवा नेता समर्थक विधायकों ने एक सुर में कहा कि यह फीडबैक तो सास,ननद को बैठाकर उसके सामने ही सुसराल की शिकायतें पूछने वाली बात हो गई।अब फीडबैक पर सास,ननद की मौजूदगी का जुमला कई स्तरों पर सुना गया। युवा नेता के समर्थकों ने नए सह प्रभारियों से लेकर दिल्ली तक भी बात पहुंचाई है लेकिन सुनी जाए तब है।

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