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क़ानूनी जानकारी

झूठी FIR से बचने के लिए क्या-क्या कानून हैं

कानून समाज की सुरक्षा हेतु बनाया गया है परंतु समाज में सभी लोगों को भिन्न-भिन्न पद और प्रतिष्ठा मिली हुई है। भारत का कानून अत्यंत विषाद है और व्यवस्था में भ्रष्टाचार दीमक की तरह लगा हुआ है। कभी-कभी यह स्थिति होती है कि किसी व्यक्ति द्वारा किसी निर्दोष व्यक्ति पर किसी अपराध का झूठा आरोप लगाया जाता है। भारत के कानून ने ऐसे झूठे आरोप पर एफआईआर नहीं किए जाने के निर्देश पुलिस अधिकारियों को दिए हैं। पुलिस अधिकारी एक निष्पक्ष व्यक्ति होता है जो अत्यंत तटस्थ है, उसका झुकाव न शिकायतकर्ता की तरफ होता है और न ही आरोपी की तरफ होता है। एक पुलिस अधिकारी का यह कर्तव्य है कि वह निष्पक्ष होकर जांच करें तथा निष्पक्ष अनुसंधान प्रस्तुत करें उसके बाद किसी मामले में एफआईआर दर्ज करें। यदि कहीं कोई अपराध होता नजर आए उस अपराध से जुड़े हुए सबूत सामने दिखाई दे तब एक पुलिस अधिकारी का यह कर्तव्य है कि वे उस अपराध से संबंधित एफआईआर दर्ज करें।

एफआईआर क्या है:- दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 154 के अंतर्गत एफआईआर दर्ज की जाती है। एफआईआर ऐसा दस्तावेज है जो किसी अपराध की पहली सूचना होता है। जब भी कोई अपराध घटित होता है तब पुलिस अधिकारी को अपराध का संज्ञान होने के बाद उसकी एफआईआर दर्ज करने का अधिकार है। धारा 154 के अंतर्गत एक पुलिस अधिकारी एफआईआर दर्ज करता है, यदि अपराध हुआ है तब एफआईआर दर्ज की जाती है तो यह स्थिति तो समाज के लिए आवश्यक है परंतु एक खतरनाक स्थिति और है जहां किसी निर्दोष व्यक्ति को किसी मामले में फंसा दिया जाता है। किसी शिकायतकर्ता द्वारा झूठी एफआईआर दर्ज कर पुलिस से मिलीभगत कर किसी व्यक्ति को फंसाया जाता है।

एफआईआर दर्ज होना भी किसी व्यक्ति के लिए खतरनाक होता है क्योंकि जब किसी प्रकरण में एफआईआर दर्ज होती है तब आरोपी पर अनुसंधान के बाद मुकदमा चलाया जाता है। यदि किसी निर्दोष व्यक्ति पर अनावश्यक रूप से मुकदमा चलाया जा रहा है यह किसी भी समाज के लिए खतरनाक है। भारत के कानून ने इस स्थिति से निपटने हेतु संपूर्ण व्यवस्था की है। यदि कोई पुलिस अधिकारी किसी शिकायतकर्ता के साथ मिलीभगत कर किसी व्यक्ति के विरुद्ध झूठी एफ आई आर दर्ज करता है तो उस व्यक्ति के पास यह अधिकार होता है कि वह न्यायालय में जाकर उस एफआईआर को रद्द करवा दें।

कैसे करवाएं रद्द:-  दंड प्रक्रिया संहिता 1973 की धारा 482 उच्च न्यायालय को अंतर्निहित शक्ति देती है। इस धारा के अंतर्गत उच्च न्यायालय को सीधे तौर पर बड़ी शक्तियां प्राप्त है। उन शक्तियों में किसी भी एफआईआर को रद्द करने की शक्ति भी प्राप्त है तथा किसी व्यक्ति पर चलाए जा रहे मुकदमे को रद्द करने की शक्ति भी प्राप्त है। यह शक्ति सर्वोच्च न्यायालय के पास नहीं है परंतु इस मामले में शक्ति उच्च न्यायालय के पास है।

किन आधारों पर रद्द कराई जा सकती है एफआईआर:- एफआईआर रद्द कराने हेतु कुछ आधार भी दिए गए हैं यदि किसी व्यक्ति के मामले में यह सभी आधार मिलते हैं या इनमें से कोई आधार मिलता है तब उस व्यक्ति द्वारा धारा 482 के अंतर्गत एक आवेदन उच्च न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया जा सकता है तथा उच्च न्यायालय के न्यायाधीश को इस मामले से अवगत कराया जा सकता है कि उसके विरुद्ध झूठी एफआईआर की गई है तथा एफआईआर को रद्द किया जाए।

झूठे तथ्य:- इस आधार के अंतर्गत यदि किसी एफआईआर के तथ्य देखने से ही झूठे साबित हो रहे हैं तथा उसे एफआईआर को देखकर यह प्रतीत हो रहा है कि झूठी एफआईआर करवाई गई है तथा पुलिस और शिकायतकर्ता की मिलीभगत से सी है एफआईआर की गई है तब उच्च न्यायालय के पास यह शक्ति है कि एफआईआर को रद्द कर दे। 

झूठे आधार:- यदि किसी एफआईआर को दर्ज करने हेतु जो आधार लिए गए हैं वह स्पष्ट रूप से झूठ है दिख रहे हैं तथा उनसे संबंधित सबूतों को उस व्यक्ति द्वारा न्यायालय में पेश किया गया है जिस पर एफआईआर दर्ज की गई है तब उच्च न्यायालय ऐसी एफआईआर को भी रद्द कर सकती है। जैसे कि कोई व्यक्ति किसी कार्य स्थल पर कार्य करता है। उस व्यक्ति द्वारा अपने अधीनस्थ कर्मचारियों को भ्रष्टाचार से रोकने का प्रयास किया जाता है तब कर्मचारी उस आला अधिकारी के विरुद्ध कोई झूठी शिकायत कर झूठी एफआईआर दर्ज कर दबाव डालने का प्रयास करते हैं इससे यह स्पष्ट लगता है कि एफआईआर केवल किसी व्यक्ति पर लांछन लगाने के उद्देश्य से की गई है तब न्यायालय से एफआईआर को रद्द कर सकता है।

यदि किसी व्यक्ति पर इस प्रकार से झूठी शिकायत कर एफआईआर दर्ज करवाई गई है तब उस व्यक्ति द्वारा दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 482 का सहारा लिया जा सकता है। इस धारा के अंतर्गत उच्च न्यायालय के समक्ष आवेदन प्रस्तुत कर राहत पाई जा सकती है। दंड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत धारा को दिए जाने का उद्देश्य पुलिस अधिकारियों द्वारा किसी भी प्रकार से कानून के विरुद्ध किए जाने वाले कार्य को रोकना है। पुलिस का समाज में भय होता है तथा पुलिस निष्पक्ष रूप से कार्य करें तो यह समाज के लिए हितकर है परंतु यदि पुलिस थोड़े से भी भ्रष्ट चले और किसी व्यक्ति के विरुद्ध की गई झूठी शिकायत पर ही मुकदमा दर्ज कर दे तब उसकी निगरानी करने के लिए उच्च न्यायालय को यह शक्ति दी गई है।

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