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छ.ग. की राजनीति: छत्तीसगढ के स्वास्थ्य मंत्री की उम्मीदों को क्यों वास्तविकता के धरातल पर जगह नहीं मिलेगी ?

22/10/2021

स्वास्थ्य मंत्री के राजनैतिक दांव पेंच को सफलता क्यों नहीं मिल पा रही है ?

प्रदेश के राजनैतिक मिजाज को उत्साहवर्धक बनाने में स्वास्थ्य मंत्री विफल क्यों हो रहे है ?

सत्ता और संगठन का तालमेल बनाकर अपनी अपेक्षाओं को क्या स्वास्थ्य मंत्री पूरा कर पायेंगे ?


पूरब टाइम्स , रायपुर . छत्तीसगढ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को प्रतिष्ठित सर्वे कंपनी ने जनता की राय में  देश का सबसे उत्कृष्ट मुख्यमंत्री बताया है . उधर भाजपा समर्थित सोशल मीडिया व कांग्रेस के कुछ असंतुष्ट लोगों ने उनकी कुर्सी को अस्थिर बताया है . हालात ये हो गये कि प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री के दिल्ली चक्कर लगाने को भी शक की निगाह से देखा जाने लगा . यदि मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की कुर्सी पर कोई बदलाव चाहती तो कांग्रेस हाई कमान द्वारा सीधे दिशा निर्देश देने में कोई भी परेशानी नहीं थी परन्तु उसने इस बात को सिरे से नकार दिया . इधर छ ग सरकार को अस्थिर करने की चाह रखने वाले स्वास्थ्य मंत्री को भी भ्रमित करने लगे , जिससे उनके द्वारा भी अस्पष्टता लिये हुए बयान बाज़ी की गई . वैसे यह मामला तूल पकड़ने  के साथ ही ठंडा हो गया है . अब देखने वाली बात यह होगी कि नेतृत्व परिवर्तन की बात को हवा देती भाजपा कब ठंडी पड़ती है और कांग्रेस नेतृत्व असंयमित कार्य व्यव्हार करने वाले अपने पार्टी के नेताओं पर कब कार्यवाही करती है . पूरब टाइम्स की एक रिपोर्ट ... 


दुविधा पूर्ण राजनैतिक स्थिति का सामना छत्तीसगढ़ राज्य को करवाने वाल असल दोषी कौन है ?

कांग्रेस का हाईकमान,  छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री और स्वास्थ्य मंत्री के तथाकथित आपसी खींचतान पर खामोश है और कांग्रेस का प्रदेश संगठन इस मामले पर प्रतिक्रिया देने से बचाता फिर रहा है लेकिन विडंबना यह है कि भाजपा का हाई कमान इस उम्मीद को कायम रखे हुए है कि कांग्रेस के दबे नेता आपस मे भिड़ेंगे और सत्ता का कुछ हिस्सा छटक कर छत्तीसगढ़ भाजपा के झोली में आ जायेगा . गौर तलब रहे कि छत्तीसगढ़ के राजनैतिक गलियारों में गरमा गर्म चर्चाएं तो हो रही है लेकिन प्रदेश के भाजपा और कांग्रेस के विधायक व नेता राजनीतिक अस्थिरता को भांपने मे विफल हो रहे है और कांग्रेस के मुख्यमंत्री और स्वास्थ्य मंत्री के दिल्ली आवाजाही पर नजर गड़ाकर प्रदेश की समस्याओं को नजरंदाज कर रहे हैं 


क्या छत्तीसगढ़ कांग्रेस के दो मजबूत स्तंभ आपसी दूरियों के निर्धारित मापदंडों तोड़कर आपस में टकरा जायेंगे ?

छत्तीसगढ़ में कायम हुई पंद्रह साल की भाजपा सरकार विगत विधानसभा चुनाव में लड़खड़ा कर  गिर गई और मजबूत विपक्ष को भूमिका के लिए भी विधायको की सम्मानजनक संख्या को भी हासिल नहीं कर पाई . जिसके बाद छत्तीसगढ़ कांग्रेस ने अपने प्रदेश अध्यक्ष को मुख्यमंत्री बनाकर छत्तीसगढ़ में अपनी सरकार स्थापित की लेकिन जैसे ही इस सरकार को उसके कामों के आधार पर भाजपा ने घेरना शुरू किया तो भूपेश बघेल सरकार ने एक ऐसा दांव खेल दिया जिसमे कांग्रेस सरकार के असंतुष्ट विधायकों के साथ - साथ असम्मान जनक विधायको के साथ छत्तीसगढ़ विधानसभा में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाने वाली भाजपा भी फंसी हुई नजर आ रही है . अब आलम यह है कि भूपेश सरकार को कमजोर बताने वाले लोग रायपुर के हवाई अड्डे पर निगरानीकर्ता की भूमिका निभाने के अलावा कुछ नहीं कर पा रहे है .

मुख्यमंत्री और स्वास्थ्य मंत्री आपसी टकराहट को मुद्दा बनाकर कूटनीतिक तरीके से छत्तीसगढ़  भाजपा को दिशा विहीन करने में सफल हो रहे है क्या ?

विगत कुछ महीनों से छत्तीसगढ़ विधानसभा का कामकाज प्रदेश को अपेक्षित उचाईया दिलाने के बजाय मुख्यमंत्री गिराओ और नया मुख्यमंत्री बनाओ,  जैसे गैर जिम्मेदाराना राजनीतिक माहौल में फंसा हुआ दिखाई पड़ रहा है . प्रेस और मीडिया का एक बड़ा तबका भी असंतुष्ट विधायकों के साथ बड़े राजनीतिक तूफान के इंतजार में प्रदेश के सर्वांगीण विकास के मुद्दे को नजरंदाज किए हुए है , इसलिए स्वाभाविक है कि इसका फायदा सिर्फ छत्तीसगढ़ के भूपेश बघेल सरकार को मिल रहा है .  छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री और स्वास्थ्य की आपसी राजनैतिक जुगलबंदी मे कांग्रेस के असंतुष्ट विधायक और भाजपा का संगठन मृगतृष्णा जैसी काल्पनिक स्थिति में फंस गया है . उल्लेखनीय है कि भाजपा और कांग्रेस का हाई कमान भी इस राजनैतिक मृगतृष्णा जैसी स्थिति का खूब मजा ले रहा है . परिणास्वरूप छत्तीसगढ़ के किसी भी नेता को केंद्र की राजनीति में अपना स्थान बनाने का अवसर नहीं मिल रहा है और बड़े नेता केंद्रीय राजनीति में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करवाने से वंचित होना पर रहा है

राजनैतिक शून्यता लाकर विपक्षी राजनीतिज्ञों को बड़ी अपेक्षाओं वाली मृगतृष्णा जैसी स्थिति में फंसाने में छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री और स्वास्थ्य मंत्री अब तक सफल नजर आ रहे है लेकिन क्या आगामी विधानसभा कार्यकाल तक भाजपा के नेता इस चक्रव्यूह में फंसे रहेंगे ?

अमोल मालुसरे, समाजसेवक और राजनैतिक विश्लेषक